मुंबई : देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बढ़ती आबादी के साथ पानी की मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भविष्य में पानी की कमी से निपटने के लिए बीएमसी ने एक बड़ी तैयारी की है। मुंबई के मनोरी में समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने के लिए निःक्षारीकरण (Desalination) प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल गई है। इस परियोजना को लेकर उठ रहे सवालों के बीच बीएमसी प्रशासन ने दावा किया है कि प्रोजेक्ट के लिए सभी जरूरी वैधानिक और पर्यावरणीय मंजूरियां प्राप्त कर ली गई हैं। साथ ही संबंधित सरकारी जमीन का अग्रिम कब्जा भी जिला प्रशासन से मिल चुका है।
मनोरी में बनने वाले इस प्रोजेक्ट की शुरुआती क्षमता 200 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) होगी। भविष्य में इसे बढ़ाकर 400 MLD तक करने की योजना है। इस तकनीक के जरिए समुद्र के खारे पानी को आधुनिक रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) प्रक्रिया से गुजारकर पीने योग्य बनाया जाएगा। परियोजना के निर्माण के बाद अगले 20 वर्षों तक इसके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी तय की गई है।
जमीन और मंजूरी को लेकर उठे सवाल
हालांकि, इस परियोजना को लेकर सब कुछ इतना आसान नहीं रहा। विकास आराखड़ा 2034 में जमीन के आरक्षण, गायरान भूमि के इस्तेमाल और स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। वॉचडॉग फाउंडेशन के ट्रस्टी गॉडफ्रे पिमेंटा ने इन मुद्दों पर आपत्ति जताते हुए बीएमसी से स्पष्टीकरण मांगा था।
इसके जवाब में बीएमसी के जल परियोजना विभाग ने बताया कि संबंधित जमीन के विकास आराखड़े से जुड़े अधिकार विकास नियोजन विभाग के पास हैं। वहीं, मुंबई उपनगर के जिलाधिकारी ने 8 दिसंबर 2025 को परियोजना के लिए सरकारी जमीन से संबंधित आवश्यक आदेश जारी किए थे।
पर्यावरण और मछुआरों की चिंता पर बीएमसी का जवाब
मनोरी परियोजना को लेकर स्थानीय मछुआरों की चिंता भी सामने आई है। उन्हें आशंका है कि समुद्र से पानी लेने और प्रक्रिया के बाद खारे पानी को वापस समुद्र में छोड़ने से पारंपरिक मछली पकड़ने, मछलियों के प्रजनन क्षेत्र और समुद्री पर्यावरण पर असर पड़ सकता है।
इस पर बीएमसी का कहना है कि समुद्र से पानी लेने के स्थान पर पानी का प्रवाह 0.15 मीटर प्रति सेकंड से कम रखा जाएगा। साथ ही मछलियों को पानी के साथ अंदर जाने से रोकने के लिए विशेष जाल लगाए जाएंगे। प्रक्रिया के बाद बचा हुआ खारा पानी मल्टीपोर्ट डिफ्यूजर के जरिए समुद्र में छोड़ा जाएगा, ताकि उसका प्रभाव नियंत्रित रखा जा सके। प्रशासन के मुताबिक, परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों के आकलन के दौरान 2021-22 में स्थानीय लोगों से भी सलाह-मशविरा किया गया था।
आगे क्या होगा?
गॉडफ्रे पिमेंटा ने परियोजना से जुड़े जमीन के स्वरूप, विकास आराखड़े और स्थानीय लोगों की आपत्तियों पर पूरी स्पष्टता आने तक काम आगे न बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के संमतिपत्र को स्थगित रखने की भी मांग उठाई है। बीएमसी का दावा है कि केंद्र सरकार की CRZ अनुमति, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल का संमतिपत्र और महाराष्ट्र मैरीटाइम बोर्ड का NOC मिल चुका है।
अब इस परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल निर्माण पूरा करना नहीं, बल्कि मुंबई की पानी की जरूरतों के साथ समुद्री पर्यावरण और स्थानीय मछुआरों की आजीविका के बीच संतुलन बनाए रखना भी होगी। आने वाले समय में मनोरी परियोजना मुंबई की जलापूर्ति के लिए कितनी कारगर साबित होती है, इस पर सभी की नजर रहेगी।


