मिग-29, मिराज और जगुआर की विदाई से बढ़ेगी चुनौती! भारत को हर साल चाहिए 40 नए लड़ाकू विमान

वायुसेना के पास सिर्फ 29 फाइटर स्क्वाड्रन, जबकि जरूरत 42.5 की; तेजस का उत्पादन बढ़ाने और स्वदेश में इंजन मरम्मत की तैयारी तेज

देश की सुरक्षा के लिए मजबूत वायुसेना होना बेहद जरूरी है। लेकिन बदलते युद्ध के तौर-तरीकों और आधुनिक सैन्य तकनीक के बीच भारतीय वायुसेना के सामने लड़ाकू विमानों की कमी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। एक तरफ पुराने मिग-29, मिराज-2000 और जगुआर विमानों को धीरे-धीरे सेवा से बाहर करने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ उनकी जगह नए लड़ाकू विमानों को शामिल करने की प्रक्रिया में तेजी लाने की जरूरत है।

पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह के मुताबिक, मौजूदा कमी को दूर करने और वायुसेना की परिचालन क्षमता बनाए रखने के लिए भारत को हर साल 36 से 40 नए लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत इतनी बड़ी संख्या में फाइटर जेट कैसे तैयार करेगा?

 42.5 स्क्वाड्रन की जरूरत, लेकिन उपलब्ध सिर्फ 29

भारतीय वायुसेना के लिए स्वीकृत लड़ाकू स्क्वाड्रन की संख्या 42.5 है, लेकिन अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, फिलहाल वायुसेना के पास करीब 29 स्क्वाड्रन ही उपलब्ध हैं। यानी जरूरत और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। पुराने लड़ाकू विमानों की घटती संख्या और नए विमानों की डिलीवरी में देरी इस चुनौती को और गंभीर बना रही है। ऐसे में वायुसेना को हर साल लगभग दो नए स्क्वाड्रन यानी 36 से 40 लड़ाकू विमान शामिल करने की जरूरत महसूस हो रही है। यह केवल विमानों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं, बल्कि देश की हवाई सुरक्षा और सैन्य तैयारियों से भी जुड़ा हुआ है।

तेजस के उत्पादन पर टिकी बड़ी उम्मीद

भारत की सरकारी विमान निर्माता कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के तेजस Mk1A कार्यक्रम को इस कमी को पूरा करने में अहम माना जा रहा है। कंपनी ने अगले साल 24 तेजस Mk1A लड़ाकू विमान बनाने की योजना रखी है। हालांकि, इसके उत्पादन की रफ्तार काफी हद तक अमेरिकी कंपनी GE Aerospace से मिलने वाले F404-IN20 इंजनों की आपूर्ति पर निर्भर करती है। इंजन मिलने में देरी होने से विमानों के निर्माण और उनकी डिलीवरी पर भी असर पड़ सकता है।

 निजी कंपनियों की भागीदारी से बढ़ सकती है रफ्तार

सिर्फ सरकारी कंपनी के भरोसे इतने बड़े लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा। इसी वजह से पूर्व वायुसेना प्रमुख ए.पी. सिंह ने लड़ाकू विमान निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया था। उनका सुझाव था कि निजी कंपनियां हर साल 12 से 18 अतिरिक्त लड़ाकू विमानों की आपूर्ति करने में मदद कर सकती हैं। टाटा-एयरबस का संयुक्त उपक्रम C-295 परिवहन विमान निर्माण इसका एक उदाहरण है। निजी कंपनियों की भागीदारी से उत्पादन क्षमता बढ़ाने और डिलीवरी में तेजी लाने का रास्ता खुल सकता है।

अब भारत में ही होगी तेजस के इंजन की मरम्मत

लड़ाकू विमान बनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उनका लंबे समय तक तैयार और ऑपरेशनल रहना भी है। इसी दिशा में GE Aerospace और भारतीय वायुसेना के बीच F404-IN20 इंजनों के रखरखाव और मरम्मत के लिए भारत में ही एक डिपो स्थापित करने का समझौता हुआ है।

इस सुविधा का स्वामित्व और संचालन भारतीय वायुसेना के पास रहेगा। वहीं GE Aerospace तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण, विशेषज्ञ कर्मचारी, स्पेयर पार्ट्स और जरूरी उपकरण उपलब्ध कराने में सहयोग करेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इंजनों की मरम्मत के लिए उन्हें विदेश भेजने पर निर्भरता कम होगी। मरम्मत में लगने वाला समय घटेगा और तेजस विमानों को दोबारा सेवा में लाना आसान हो सकेगा।

भारतीय रक्षा क्षेत्र में GE की अहम भूमिका

GE Aerospace पिछले करीब 40 वर्षों से भारत के विमानन क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। पुणे में इसका विनिर्माण संयंत्र है और कंपनी 13 भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी कर रही है। भारतीय रक्षा क्षेत्र में GE के अलग-अलग इंजन कई महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल होते हैं। इनमें नौसेना के P-8I निगरानी विमान, MH-60R हेलीकॉप्टर, वायुसेना के अपाचे हेलीकॉप्टर और INS विक्रांत जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। हालांकि, इन सभी में F404-IN20 इंजन का इस्तेमाल नहीं होता। यह इंजन खास तौर पर तेजस Mk1 और Mk1A विमानों से जुड़ा है।

चुनौती सिर्फ नए विमान खरीदने की नहीं, आत्मनिर्भर बनने की भी

भारतीय वायुसेना के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती पुराने विमानों की जगह आधुनिक लड़ाकू विमान शामिल करने के साथ-साथ अपनी मौजूदा क्षमता बनाए रखने की है। इसके लिए तेजस का उत्पादन बढ़ाना, इंजन की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करना और निजी कंपनियों को निर्माण से जोड़ना जरूरी होगा।

कुल मिलाकर, हर साल 36 से 40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत भारत के सामने एक बड़ा लक्ष्य है। लेकिन यह लक्ष्य सिर्फ विमानों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। देश को ऐसी व्यवस्था तैयार करनी होगी, जहां लड़ाकू विमानों का निर्माण, रखरखाव और तकनीकी सहयोग भी भारत में मजबूत हो। आखिरकार, मजबूत वायुसेना का आधार सिर्फ आधुनिक विमान नहीं, बल्कि उन्हें हर परिस्थिति में उड़ान के लिए तैयार रखने की क्षमता भी है।

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