देश में दो से अधिक बच्चे होने पर स्थानीय स्वराज संस्थाओं का चुनाव लड़ने से रोकने वाले नियम को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि देश में घटते जन्मदर और बदलते जनसंख्या आंकड़ों को देखते हुए दो बच्चों की नीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत हो सकती है। कभी जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से बनाए गए ये नियम क्या अब अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं? अदालत की टिप्पणी ने इस सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़ा है। तीसरे बच्चे के जन्म के कारण उन्हें सरपंच पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अयोग्यता के फैसले को रद्द कर दिया। इसी सुनवाई के दौरान अदालत ने दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों के औचित्य पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए।
दरअसल, साल 2003 में ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के तहत दो से अधिक जीवित संतान वाले लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले प्रावधान को बरकरार रखा था। उस समय इस नियम का उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देना था।
बदलते समय के साथ बदलनी चाहिए नीति?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सबसे अहम पहलू देश में लगातार घटती प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) है। अदालत ने बदलती जनसांख्यिकी का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जिस उद्देश्य से कभी दो बच्चों का नियम बनाया गया था, क्या आज भी उसकी उतनी ही आवश्यकता है? अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अगर बदलती जनसंख्या की स्थिति को ध्यान में रखकर पुरानी नीतियों और प्रतिबंधों की समीक्षा नहीं की गई, तो भविष्य में इसके गंभीर सामाजिक और आर्थिक परिणाम सामने आ सकते हैं।
हजारों जनप्रतिनिधियों की उम्मीदें बढ़ीं!
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद उन लोगों के बीच उम्मीद जगी है, जो दो से अधिक बच्चों के कारण स्थानीय निकायों का चुनाव लड़ने से वंचित रह जाते हैं। हालांकि, अदालत की टिप्पणी को पूरे देश में दो बच्चों का नियम तत्काल समाप्त होने का फैसला नहीं माना जाना चाहिए। इसके लिए संबंधित कानूनों में बदलाव की आवश्यकता होगी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बदलती जनसंख्या परिस्थितियों को देखते हुए सरकारें भी पुराने नियमों की समीक्षा करेंगी? फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने जनसंख्या नियंत्रण की नीति और चुनाव लड़ने के अधिकार के बीच एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।


