कराड : महाराष्ट्र में गन्ना पेराई सत्र की शुरुआत से पहले ही गन्ने के दाम को लेकर माहौल गरमा गया है। एक ओर चीनी मिलें पेराई सत्र शुरू करने की तैयारी में हैं, तो दूसरी ओर किसान संगठन गन्ने का उचित दाम मिलने की मांग पर अड़े हैं। स्वाभिमानी शेतकरी संगठन, बलिराजा शेतकरी संगठन और अन्य किसान संगठनों ने गन्ने के लिए प्रति टन साढ़े पांच हजार रुपये की मांग उठाई है। मांग पूरी नहीं होने पर गन्ने की कटाई नहीं करने और परिवहन रोकने का रुख अपनाया जा रहा है। इससे चीनी मिलों के सामने पेराई सत्र सुचारु रूप से चलाने की चुनौती खड़ी हो गई है।
बढ़ती लागत से परेशान किसान, उचित दाम की मांग
गन्ने की खेती करना किसानों के लिए लगातार महंगा होता जा रहा है। खाद, कीटनाशक, मजदूरी, सिंचाई, बिजली और खेतों की जुताई पर होने वाला खर्च बढ़ने से खेती का आर्थिक गणित बिगड़ रहा है। ऐसे में किसानों का कहना है कि उन्हें उनकी मेहनत और बढ़ती लागत के अनुसार गन्ने का दाम मिलना चाहिए।
किसानों के लिए यह सिर्फ गन्ने के दाम बढ़ाने की मांग नहीं है, बल्कि पूरे साल की मेहनत का उचित मूल्य पाने का सवाल है। फसल तैयार करने से लेकर उसकी कटाई तक किसान को लगातार खर्च करना पड़ता है। ऐसे में यदि उपज का पर्याप्त दाम नहीं मिलता, तो खेती से होने वाली कमाई पर सीधा असर पड़ता है। इसी वजह से किसान संगठन इस बार गन्ने के दाम को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। साढ़े पांच हजार रुपये प्रति टन की मांग को लेकर आंदोलन तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।
चीनी मिलों के सामने पेराई सत्र की चुनौती
गन्ना पेराई सत्र समय पर शुरू होना चीनी मिलों के लिए बेहद जरूरी होता है। इसके लिए गन्ने की उपलब्धता, मजदूरों की व्यवस्था, कटाई, परिवहन और प्रतिदिन की पेराई क्षमता का नियोजन पहले से करना पड़ता है। लेकिन पेराई सत्र की शुरुआत में ही गन्ने के दाम को लेकर आंदोलन तेज होने से इस पूरी व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका है। यदि गन्ने की कटाई और ढुलाई बाधित होती है, तो मिलों तक समय पर गन्ना पहुंचाना मुश्किल हो सकता है। इससे पेराई की गति प्रभावित होने के साथ चीनी उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, किसानों की मांग पूरी करने के लिए चीनी मिलों को अपनी आर्थिक स्थिति, चीनी की बिक्री से होने वाली आय और अन्य उप-उत्पादों से मिलने वाले राजस्व का हिसाब भी देखना होगा। ऐसे में किसानों की मांग और मिलों की आर्थिक क्षमता के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होगी।
‘उचित दाम नहीं तो गन्ने की कटाई नहीं’
स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के जिला अध्यक्ष देवानंद पाटील ने गन्ने की खेती की बढ़ती लागत का मुद्दा उठाते हुए चीनी मिलों से साढ़े पांच हजार रुपये प्रति टन का दाम घोषित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि महंगाई के कारण गन्ने की खेती करना मुश्किल होता जा रहा है। इसके बावजूद विकल्पों की कमी के कारण किसान गन्ने की खेती कर रहे हैं।
पाटील के अनुसार, बढ़ती उत्पादन लागत और चीनी के दाम में आए बदलाव को ध्यान में रखते हुए किसानों को उचित मूल्य मिलना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मांग पूरी नहीं होने पर किसान गन्ने की कटाई नहीं करें और आंदोलन के लिए तैयार रहें। वहीं, बलिराजा शेतकरी संगठन के संस्थापक पंजाबराव पाटील ने भी किसानों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए गन्ने का उचित दाम देने की मांग की है। उन्होंने चीनी मिलों से इस वर्ष पांच हजार रुपये प्रति टन का दाम देने की मांग करते हुए कहा कि किसानों की मांगों पर ध्यान दिए बिना मिलों का संचालन शुरू नहीं किया जाना चाहिए।
अब बातचीत से निकलेगा रास्ता?
गन्ने के दाम को लेकर बढ़ता तनाव आने वाले दिनों में किस रूप में सामने आएगा, यह चीनी मिल प्रबंधन और किसान संगठनों के बीच होने वाली बातचीत पर निर्भर करेगा। यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती, तो पेराई सत्र के शुरुआती चरण में ही बाधाएं बढ़ सकती हैं। फिलहाल किसानों की मांग है कि उनकी लागत और मेहनत को ध्यान में रखकर गन्ने का दाम तय किया जाए। वहीं, चीनी मिलों के लिए समय पर पेराई शुरू करना जरूरी है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या किसानों की मांगों पर सहमति बन पाएगी या गन्ना दर का यह विवाद आंदोलन का रूप लेगा? आने वाले दिनों में होने वाली चर्चाएं और निर्णय महाराष्ट्र के गन्ना उत्पादक किसानों के साथ-साथ चीनी मिलों के पेराई सत्र की दिशा भी तय करेंगे।


