नागपुर : महावितरण की नागपुर प्रादेशिक आंतर परिमंडलीय नाट्य स्पर्धा के दूसरे दिन मंच पर सिर्फ कहानियां नहीं दिखाई गईं, बल्कि समाज के उन कड़वे सच से भी दर्शकों का सामना हुआ, जिन पर अक्सर बात करने से लोग बचते हैं। नागपुर और चंद्रपुर परिमंडल की ओर से प्रस्तुत ‘थलाई कुथल’ और ‘एक होती राणी’ ने सामाजिक कुप्रथाओं, गरीबी, पारिवारिक संघर्ष और महिला के आत्मसम्मान जैसे गंभीर मुद्दों को प्रभावी ढंग से सामने रखा।
‘थलाई कुथल’ ने दिखाया बुजुर्गों का दर्द
दिन के पहले सत्र में नागपुर परिमंडल की ओर से सलीम शेख लिखित ‘थलाई कुथल’ नाटक प्रस्तुत किया गया। तमिलनाडु के ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्ग या गंभीर रूप से बीमार लोगों को कथित रूप से जबरन मृत्यु की ओर धकेलने वाली अमानवीय प्रथा को नाटक का आधार बनाया गया। गरीबी और इलाज का खर्च उठाने में असमर्थता के बीच अपने ही परिवार के बुजुर्गों को खोने की स्थिति कितनी पीड़ादायक हो सकती है, इसे कलाकारों ने भावनात्मक ढंग से मंच पर उतारा। नाटक में एक तरफ अपनों के प्रति प्रेम था, तो दूसरी ओर आर्थिक मजबूरी का दर्द भी दिखाई दिया। कहानी दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि मुश्किल हालात चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों, बुजुर्गों के प्रति संवेदना और जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
‘एक होती राणी’ में दिखा महिला के आत्मसम्मान का संघर्ष
दूसरे सत्र में चंद्रपुर परिमंडल की ओर से प्रकाश गडदे लिखित ‘एक होती राणी’ का मंचन किया गया। पंजाब के एक गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित इस नाटक में सामाजिक रूढ़ियों, पारिवारिक रिश्तों और महिला के अस्तित्व से जुड़े संघर्ष को सामने रखा गया। पती की अचानक मृत्यु के बाद ‘रानो’ को सामाजिक परंपरा के नाम पर अपने देवर मंगल के साथ ‘चादर पांघरून’ विवाह के लिए मजबूर किया जाता है। इसके बाद परिवार के रिश्तों में पैदा होने वाला तनाव कहानी को भावनात्मक मोड़ देता है।
रानो और मंगल जिस संयम और मजबूती से परिस्थितियों का सामना करते हैं, वह दर्शकों को रिश्तों और सामाजिक परंपराओं को नए नजरिए से देखने का मौका देता है। नाटक यह सवाल भी उठाता है कि किसी भी रिश्ते या परंपरा से पहले महिला की इच्छा, सम्मान और आत्मसम्मान को कितनी अहमियत दी जानी चाहिए।
अभिनय ने छोड़ी गहरी छाप
दोनों नाटकों की कहानी भले अलग थी, लेकिन दोनों ने समाज के सामने मौजूद गंभीर सवालों को मंच पर प्रभावी तरीके से रखा। कलाकारों के दमदार अभिनय और संवेदनशील प्रस्तुति को दर्शकों के साथ-साथ परीक्षकों की भी सराहना मिली। नाट्य स्पर्धा का दूसरा दिन इस मायने में खास रहा कि मंच पर मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों को कुछ देर रुककर अपने आसपास के समाज और रिश्तों के बारे में सोचने का मौका भी मिला।


