आध्यात्मिकता से एकात्मता की ओर बढ़ता है मनुष्य : प्रो. ए. डी. एन. वाजपेयी

नागपुर यूनिवर्सिटी में ‘एकात्म मानव दर्शन और भारतीय लोक’ पर राष्ट्रीय परिसंवाद का समापन

नागपुर : मनुष्य के मन, बुद्धि और चित्त की शुद्धता ही उसे एकात्मभाव के करीब ले जाती है। आध्यात्मिकता को एकात्मता की कसौटी बताते हुए हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और प्रख्यात विचारक प्रो. ए. डी. एन. वाजपेयी ने कहा कि जब व्यक्ति का अंतःकरण शुद्ध होता है, तब उसे मनुष्य, समाज, प्रकृति और पूरी सृष्टि के बीच मौजूद एकात्मता का अनुभव होने लगता है।

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, दर्शनशास्त्र विभाग, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली और प्रज्ञा प्रवाह, विदर्भ विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘एकात्म मानव दर्शन और भारतीय लोक’ विषय पर 26 और 27 सितंबर को दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया। रविवार, 27 सितंबर को हुए समापन सत्र में प्रो. ए. डी. एन. वाजपेयी ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन में व्यक्ति, समाज और परम तत्व का समग्र विचार दिखाई देता है। मानव जीवन शरीर, मन, बुद्धि, चित्त और आत्मा के मेल से बनता है। समाज के कल्याण के लिए व्यक्ति का शुद्धिकरण जरूरी है और योग, ध्यान तथा प्राणायाम इसके माध्यम हो सकते हैं।

प्रो. वाजपेयी ने भारतीय परंपराओं को ज्ञान, विज्ञान, आध्यात्मिकता और गौरवशाली विरासत का वाहक बताते हुए कहा कि इन परंपराओं का निष्ठापूर्वक पालन किया जाना चाहिए।

एकात्म मानव दर्शन में विश्वकल्याण का विचार

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के प्र-कुलगुरु डॉ. अखिलेश पेशवे ने कहा कि एकात्म मानव दर्शन केवल भारत के कल्याण की बात नहीं करता, बल्कि पूरी दुनिया और प्रकृति के कल्याण को अपने विचार में शामिल करता है। उनके अनुसार, मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में भी इस दर्शन में समाधान की दिशा दिखाई देती है। गोवा विश्वविद्यालय के डॉ. भूषण भावे ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों में जल प्रबंधन, मिट्टी संरक्षण, सांस्कृतिक जागरण, पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और स्वदेशी जैसे विषयों को भी महत्व दिया गया था।

देशभर से आए विद्वानों ने रखे विचार

दो दिवसीय परिसंवाद में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए विद्वानों ने एकात्म मानव दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज ने भारतीय राजनीति में आदर्शों की आवश्यकता पर बात की। जम्मू विश्वविद्यालय के डॉ. पुरुषोत्तम ने समाज को विभाजित करने वाली शक्तियों और चुनौतियों से निपटने के लिए एकात्म मानव दर्शन की प्रासंगिकता बताई।

बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के डॉ. पुनीत बिसारिया ने साम्यवाद और एकात्म मानव दर्शन के बीच विचारों के अंतर को रेखांकित किया और कहा कि एकात्म मानव दर्शन में संपूर्ण सृष्टि को समग्र रूप से देखने की बात कही गई है। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के डॉ. गिरिजाशंकर गौतम ने दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन को सामाजिक समरसता का आधार बताया। वहीं नागपुर के डॉ. शंकरराव वानखेडे ने उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. रणंजय सिंह ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों में समाज के अंतिम और वंचित व्यक्ति के उत्थान की चिंता दिखाई देती है। उनके अनुसार, समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के विकास के बिना समग्र विकास की अवधारणा पूरी नहीं हो सकती। परिसंवाद के संयोजक और हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित राष्ट्रनायक बताया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. लखेश्वर चंद्रवंशी ने किया।

114 विद्यार्थियों का हुआ सम्मान

समापन कार्यक्रम में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, विदर्भ प्रांत की ओर से हिंदी पखवाड़े के अवसर पर आयोजित निबंध और भाषण प्रतियोगिता के विजेताओं का भी सम्मान किया गया। निबंध प्रतियोगिता का विषय ‘इंडिया नहीं, भारत’ और भाषण प्रतियोगिता का विषय ‘संपर्क भाषा हिंदी’ रखा गया था।

शहर की 19 शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यार्थियों ने इन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। समापन सत्र में दोनों प्रतियोगिताओं के 114 विद्यार्थियों को हिंदी विभाग की पूर्व विद्यार्थी परिषद की ओर से स्मृतिचिह्न और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शोधार्थियों के साथ हिंदी विभाग के विद्यार्थी भी बड़ी संख्या में मौजूद रहे।

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