प्रा. डॉ. सतीश का. शिरसाठ ✍️
मेरे एक परिचित सज्जन थे। पेशे से वे तलाठी थे, इसलिए लोग उन्हें ‘भाऊसाहेब’ के नाम से जानते थे। हालांकि, मुझे हमेशा लगता था कि स्वभाव से यह इंसान बिल्कुल सीधी-सादी, भोली गाय जैसा है। लेकिन तलाठी के रूप में ये कैसे व्यवहार करते होंगे? बाद में उनके इस स्वभाव का रहस्य मेरे सामने खुला। तलाठी के रूप में उन्हें लोगों के साथ जैसा रोखठोक व्यवहार करना चाहिए, वैसा ही वे करते थे। मेरे साथ उनका व्यवहार बेहद मधुर था।
मैं गांव छोड़कर पुणे आ गया, फिर भी हमारी दोस्ती उसी तरह कायम रही।
माधुरी नाम की उनकी एक बेटी किसी स्कूल में शिक्षिका की नौकरी करती थी। एक दिन मैं गांव में एक कार्यक्रम के दौरान उनसे मिला। उन्होंने अपने साथ मौजूद एक युवक से मेरा परिचय कराया।
“ये मेरे रिश्तेदार हैं। शिक्षक हैं।”
मैंने उस युवक का दिल से अभिनंदन किया। वह बहुत बातूनी था।
“आप क्या करते हैं?” उसने मुझसे पूछा।
“मैं भी शिक्षक हूं, पुणे में,” मैंने कहा।
“आपको विंग्लिश भाषा आती होगी ना?” उसने पूछा।
“थोड़ी-थोड़ी आती है। स्कूल में जितनी सीखी थी, उतनी ही थोड़ी-बहुत,” मैंने कहा।
“आपको पुणे में नूमवि स्कूल के बारे में पता होगा ना?” उसने पूछा।
“सुना है। उसका क्या?” मैंने पूछा।
“वैसी ही क्वालिटी का बढ़िया स्कूल हमारे यहां है। मैं वहीं शिक्षक हूं,” उसने कहा।
उसी से मुझे अंग्रेजी के लिए ‘विंग्लिश’ यह नया शब्द पता चला।
हम जब जुन्नर में रहते थे, उस समय की एक याद है। जुन्नर वैसे तालुका स्तर का बड़ा गांव था। गणेशोत्सव के दौरान मैं देखता था कि गांव में जगह-जगह सार्वजनिक गणेशोत्सव बड़े धूमधाम से मनाए जाते थे। हर गणपति के सामने कोई न कोई प्रसंग, चलते-फिरते दृश्य या सुंदर सजावट की गई होती थी। हमारे घर में भी गणपति बैठते थे, लेकिन उनके सामने ऐसा कुछ नहीं होता था।
एक दिन मैंने माता-पिता के सामने जिद पकड़ ली, “मुझे भी नया गणपति चाहिए और उसके आसपास ऐसा कुछ सुंदर-सुंदर चाहिए।”
माता-पिता ने मुझे बहुत समझाने की कोशिश की कि वे सार्वजनिक गणपति होते हैं। अपने घर में हम ऐसा नहीं करते। लेकिन मेरी समझ में यह बात नहीं आई। मैं रो-रोकर हंगामा करने लगा।
एक दिन स्कूल से घर आया तो एक अद्भुत दृश्य देखा।
एक कमरे में कई लोहे की पेटियां एक-दूसरे के ऊपर रखी थीं और उन्हें मां की सुंदर साड़ियों से चारों तरफ से ढका गया था। किनारों पर घर में मौजूद ऐसे ही मलमल के कपड़ों से सुंदर सजावट की गई थी। पेटियों पर मेरे खिलौने और गमले व्यवस्थित तरीके से रखे गए थे। सबसे ऊपर शीशे लगाए गए थे और एक आकर्षक प्लास्टिक का गणपति सबका ध्यान खींच रहा था। घर के गणपति से भी वह दृश्य अधिक मनमोहक लग रहा था।
जमीन पर एक पानी के फव्वारे से पानी फुहारों की तरह ऊपर उठ रहा था। उस साल से मेरे लिए ऐसा अलग गणपति बैठने लगा।
आगे कई वर्षों तक मेरा ऐसा स्वतंत्र गणपति बैठता रहा।
बाद में एक साल उदापुर आने के बाद यह परंपरा बंद हो गई। उसका इतिहास भी काफी रोचक है।
मेरा एक चचेरा भाई पुणे गया था। वापस आने पर उसने पिता से कहा,
“पुणे से मैं गणपति की एक सुंदर मूर्ति लाया हूं। लेकिन वह बहुत महंगी मिली। सात रुपये की पड़ी। क्या इस साल हम दोनों परिवार मिलकर एक साथ गणपति बैठाएं? मूर्ति दोनों परिवारों की रहे?”
वह प्लास्टर ऑफ पेरिस की एक आकर्षक मूर्ति थी। पिता ने हामी भर दी और हमारे दोनों परिवारों की ओर से एक साथ गणपति बैठाया गया।
उस समय सात रुपये की कीमत भी काफी ज्यादा लगती थी। मुझे याद है, दादा कोंडके ने उस समय की सस्ती चीजों का वर्णन करते हुए ‘केले आण्याला ss दोन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।
उस साल से हमारे घर में मेरा अलग गणपति बैठना बंद हो गया। घर के गणपति के सामने ही मैं सुंदर सजावट करने लगा।
नौकरी लगने के बाद हम पुणे आकर रहने लगे। कई घर बदले। गणपति के सामने कुछ अलग और हटकर करने का तरीका भी परिस्थितियों के अनुसार बदलता गया। आगे चलकर घर पर समय कम मिलता गया और ‘गणपति बैठाना’ एक पारिवारिक रस्म बनकर रह गया।
नौकरी से रिटायर होने के बाद इन दिनों साल में कम से कम छह महीने मैं अपनी बेटी के पास इंग्लैंड में रहता हूं। वहां की सर्दियां बहुत ठंडी होती हैं। इसलिए हम आमतौर पर वहां गर्मियों में जाते हैं। हमारा गणपति का त्योहार भी वहीं मनाया जाता है।
इस साल भी स्थिति ऐसी ही थी।
एक दिन दोपहर में मैं ऊपर के कमरे में सो रहा था। उठकर नीचे आया तो देखा कि हॉल का पूरा कायापलट हो चुका था। सब कुछ व्यवस्थित तरीके से सजा और रखा हुआ था। सोफे पर बेटी बैठकर पढ़ाई कर रही थी। मैंने आते ही आंखें बड़ी-बड़ी करके यह सब देखा तो वह हंसकर बोली, “मां ने सब किया है।”
पत्नी ने तुरंत सफाई दी,
“अगले सप्ताह बाप्पा बैठने वाले हैं ना। इसलिए।”
मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गए। बस फिर क्या था!
बाप्पा के आगमन के साथ पूरे घर की सफाई युद्धस्तर पर शुरू हो गई।
एक दोपहर लंदन से बाप्पा की सुंदर मूर्ति भी लाई गई। और गणेश चतुर्थी के दिन हमारे इंग्लैंड वाले घर में — उस नूमवि स्कूल के शिक्षक के शब्दों में कहें तो ‘विंग्लिश’ — बाप्पा विराजमान हो गए।


