रश्मी कुळकर्णी ✍️
हिंदू धर्म के आराध्य दैवत भगवान श्री गणेशजी को आद्यपूजन का सम्मान प्राप्त हैं | शिवनंदन अनंत नामोंसे जाने जातें हैं | वे सारे नाम उनकी दातृत्व के गुणों के अंकित हैं|
उन में से ही एक नाम हैं “चिंतामणी”! हम सब जानते हैं की अष्टविनायक के पंचम रूप को हम “चिंतामणी” के रूप में देखते हैं! पश्चिम महाराष्ट्र के अष्टविनायक दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं!
परंतु..विदर्भ प्रांत में भी स्वयंभू अष्टविनायक स्थित हैं!..जिनमें से कलंब के चिंतामणी ; चिंता हरण करनेवाले जागृतावस्थी गणेशजी जाने जाते हैं!
कलंब तहसील यवतमाल जिले में यवतमाल से 22-23 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ गाँव हैं! अमरावती , वर्धा , चंद्रपूर , नांदेड , हिंगोली , वाशीम यह यवतमाल के पडोसी जिले हैं !
जनकथा के अनुसार कलंब के श्री चिंतामणी गणेशजी की स्थापना श्री इंद्रदेव द्वारा की गई | जमीन की सतह से लगभग तैतीस से पैतीस फिट निचे श्री गणेशजी का यह मंदिर बसा हुआ हैं |
श्री गणेश पुराण से ज्ञात होता हैं की इस मंदिर का संबंध गौतम ऋषी – देवी अहल्या तथा इंद्रदेव से जुडा हुआ हैं | यह कहानी भौतिक भावोंसे अतीव मोह तथा शाप , भक्ती , संयम एवम् प्रायश्चित्त की परिसीमा की मानों मार्गदर्शिका हैं |
श्री ब्रह्मदेव की मानसपुत्री देवी अहल्या सौंदर्यवती थी | वह गौतम ऋषी की पत्नी थी | वह धार्मिक, अध्यात्मिक साधना से बडी ही तेजोमय दिखती थी | वह आदर्श पतिव्रता थी | एक बार उसके सौंदर्य से मोहित होकर देवराज इंद्र ने गौतम ऋषी का भेस लेकर देवी अहल्या से अनुचित व्यवहार किया | अपनी तपोबल से मुनी ने यह विकृत कृती जानकर इंद्रदेव को “सहस्त्राक्ष” अर्थात..पूरे तनपर सहस्र घाव होने का शाप दिया तथा देवी अहल्या को इंद्रदेव के छल, कपट को जान न पाने के लिए शिला जैसी अचल रहने का शाप दिया | जब अहल्याने अपने पातिव्रत्य का उच्चार किया और क्षमा भी माँगी तब गौतम ऋषी ने कहाँ की श्रीराम जब आपके पाषाणवत् , साधना में लीन तन को स्पर्श करेंगे तब आप को फिर से यहँ तेजस्वी रूप प्राप्त होगा |
इंद्रदेव अपनी दुर्दैवी अवस्था की वजह से कमलपुष्प के कमलनाल में जा कर छिप गए | अंतत: देवोंके गुरू श्री बृहस्पती ने उन्हें गौतम ऋषी से क्षमायाञ्चना करने की सलाह दी | देवेंद्र ने क्षमा की याञ्चना करते ही क्षमाशील गौतम ऋषीने उन्हे “कदंब नगरी” में जाकर कदंब के पेड तलें श्री गणेश की तपस्या करने का उ:शाप दिया | इंद्रदेव ने अपनी तपस्या से श्री गणेशजी को प्रसन्न किया | श्री गणेशजी ने वहाँ अपने शस्त्र से एक कुंड बनाया जिसमें गंगाजी को पाचारित किया और देवेंद्र को उस गंगाजल से स्नान करते ही उनका स्वास्थ्य ठीक होने का आशीर्वाद दिया | वह कुंड “गणेश कुंड” नाम से जाना जाता हैं |
साढेचार फिट के श्री चिंतामणी गणेश मूर्ती की स्थापना कलंब में अपनी तपोभूमी पर कर इंद्रदेव फिर अपने इंद्रलोक पहूँचे |
हर चिंता का हरण करनेवाले…नाम स्मरण के मात्र “चिंतामणी” से सारे दुख हरने वाले..अपने निस्सीम भक्त के भक्ती को हरवक्त अपने मुकुट में चिंतामणी के रूप में धारण करने वाले श्री गणेशजी आज भी अपने प्रीय भक्तों के लिए कलंब में सदैव जगृत अवस्था में स्थित हैं |
यथावकाश श्रीराम युग आया और श्रीराम मिथिला नगरी की ओर प्रस्थान करते हुए गौतम आश्रम में अहल्या को अपने स्पर्श मात्र से उनका तेजोमयी रूप प्रदान कर उन्हे शिलावस्था से मुक्त करते हुए मिथिलानगरी में पहूँचे |
यह काले पत्थरों से बना हेमाडपंथी मंदिर बडा ही प्रसन्न हैं| हर बारवें साल गणेश कुंड में गंगाजी प्रकट होकर गणेशजी के पद प्रक्षालित करती हैं|


