रेखा भिवगडे ✍️
नवरात्री का नवम दिन. तपस्या के फलप्राप्ती का. सिद्धीदात्री माता को समर्पित हैं।
या देवी सर्वभूतेषु।
सिद्धी रूपेण संस्थिता।। नमस्तयै, नमस्तयै। नमस्तयै नमो नमः।।
शक्ती उपासना का अत्युत्तम नवरात्री पर्व.
तप का परिपाक कर सभी सिध्दियों को प्रदान करने वाली, माता सिद्धि दात्री की जय हो.
भगवान शिवजीने इन्ही का ध्यान, तप कर समस्त सिद्धियों की कृपा प्राप्त कर, अर्धनारीश्वर रूप पाया। माता दिव्य स्वरूपा, अवलौकिक रूपा, कमल फूल पर विराजमान होती हैं।
इनकी सवारी का वाहन सिंह (शेर) हैं। चार भुजाओंवाली देवी, भुजाओं में चक्र, गदा, शंख, एवं कमल धर, मयूर पंखी वस्त्र,स्वर्ण आभूषणोंसे सुसज्जिता हैं। माता सौम्य मुद्रा,शांत, विलोभनीया, भक्तों को अभय प्रदान करनेवाली हैं।
माता सिद्धिदात्री दैत्यराज शुंभ का वध करनेवाली, भक्तों में विराजमान शुंभ याने अहंकार, दर्प, घमंड, “मैं ही सब कुछ हूं”, वृत्तियों का विस्थापन, विसर्जन कर, भक्तों की शुद्ध बुद्धी जागृत कर, आणिमा, माहिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व आदी अष्ट सिद्धीयाँ प्रदान करती हैं। इसे ऋषि मार्कंडेय पुराण में विस्तृत रूप से स्पष्ट किया हैं।
ब्रम्हांड पुराणानुसार देवी अपनी कृपादृष्टी से सृष्टी की ऊर्जा और शक्तियों का संतुलन बनाये रखती हैं।
माता का मयूर पंखी वस्त्र प्रवरण समृद्धी, शांती, सकारात्मकता, ऊर्जा, ताजगी, प्रकृती का उल्हास, उम्मीद, नूतन शुरुआत,सद् भाव का प्रतीक हैं। मयूर पंखी रंग, प्रकाश से उत्पन्न दृष्टी भ्रम हैं। मयूरपंखी रंग में, नीला, हरा, सुनहारा और बैंगनी रंग संमेलित हैं। वे सृष्टी के
प्रमुख तत्व जल, पृथ्वी, अग्नी और आकाश का संतुलित प्रतिनिधित्व करते हैं। इन चार रंगो से जब प्रकाश किरणें टकराती हैं, तो यह असीम चमकदार और अपने संमोहक इंद्रधनुषी रूप में दर्शन देता हैं।
इसकी पवित्रता, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहू-केतू और कालसर्प की नकारात्मकता को शांत करती हैं।
माता सिद्धीदात्रीने ऊपर के दाहिनी भुजा में, धारण किया चक्र, काल, धर्म तथा निरंतरता का प्रतीक हैं। चक्र परिभ्रमण से अधर्म का नाश होकर मन का नियंत्रण तथा अनुशासन स्वयंचलित होता हैं।
ऊपर के वाम भुजा में धारण किया शंख, नाद ध्वनी, ब्रम्हांड की उत्पत्ती का प्रतिनिधित्व करता हैं। नकारात्मक ऊर्जा नष्ट कर, शुभता, शुचिता का संचलन करता हैं। विषाणू को नष्ट करता हैं। वातावरण में शुद्धि लाता हैं।
निचे के दायनी भुजा में धारण की गदा, अहंकार, भौतिक-मानसिक काम, क्रोध, लोभ, मोह, आसक्ती को नष्ट कर, बुराईयों पर विजय पाने की शक्ति, आत्मबल, न्याय उर्वरता का प्रतीक हैं।
निचे के वाम भुजा का पद्म, पवित्रता, अनासक्ती, ज्ञान का सर्वोच्च प्रतीक हैं। किचड़ में रहकर भी, विमल, सुंदर, सुस्वरूप बने रहना, माया के बंधनो में विकारों के सायों में भी शुद्ध,पवित्र हो ईश्वर भक्ती में लीन रहना तथा मन की सर्वोत्तम आनंदमय सर्वोच्च भावस्थिती का प्रतीक हैं।
साधक नियम, निष्ठा और प्रतीकों के यथा योग्य गुणों का अवलंब कर, सुयोग्य साधना, पूजा विधि, भोग आदि में, गंगा जल से पवित्रता कर, लाल रंग के वस्त्र, फल-फूल, शृंगार सामग्री अर्पण कर, तिल, हलवा, पुरी का भोग लगाये, तथा कन्याओं का कुंजिका पूजन कर, देवी स्वरूपा मान, भोजन करवा कर आशीर्वाद लेने के लिए-
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमानासदाभूयात सिद्धिदासिद्धीदायिनी।।
मंत्र का जप करते हुए, मात्र भौतिक सुखों की ही नहीं, अपितु आत्मिक शांती और मोक्ष प्राप्ति के लिए, नौवे दिन, नौ दिनों की तपस्या पूर्ण कर प्रकाशमय जीवन की प्राप्ती करें।
🙏 जय माता सिद्धी दात्री।
सुख मांगल्य कुरूत सर्वत्री।।



