पुणे : पुणे के खाणे मारुति चौक स्थित चर्चित ‘बर्गर किंग’ पर खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की कार्रवाई के बाद अब एक नया विवाद सामने आया है। पुणे कैंटोनमेंट बोर्ड का दावा है कि इस व्यावसायिक प्रतिष्ठान को बोर्ड की ओर से कारोबार शुरू करने की अनुमति ही नहीं दी गई थी। इतना ही नहीं, प्रतिष्ठान के पास ट्रैफिक और फायर विभाग से जरूरी NOC भी नहीं होने की बात सामने आई है।
पुणे-सोलापुर हाईवे पर खाणे मारुति चौक के मोड़ पर स्थित यह प्रतिष्ठान काफी भीड़भाड़ वाला माना जाता है। यहां रोज बड़ी संख्या में युवा और अन्य ग्राहक पहुंचते हैं। पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण कई ग्राहक अपने वाहन सड़क के किनारे या आसपास खड़े कर देते हैं। इससे इस इलाके में ट्रैफिक जाम की समस्या भी अक्सर देखने को मिलती है।
रोज उमड़ती है भारी भीड़
बताया जा रहा है कि यहां रोजाना करीब 3 से 4 हजार ग्राहक पहुंचते हैं। खासकर बर्गर लेने के समय पहले मंजिल से लेकर सड़क के बाहर तक कतारें लग जाती हैं। बड़ी संख्या में लोग अपने वाहन जहां जगह मिलती है, वहीं खड़े कर देते हैं। इससे ट्रैफिक व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ता है। कैंटोनमेंट प्रशासन के मुताबिक, प्रतिष्ठान के लिए जरूरी लाइसेंस और विभागीय मंजूरियों का अभाव सामने आया है। ऐसे में सवाल यह है कि बिना आवश्यक अनुमति के इतने बड़े स्तर पर व्यावसायिक गतिविधि आखिर कैसे चलती रही?
FDA की कार्रवाई पर कैंटोनमेंट का सवाल
कैंटोनमेंट बोर्ड का कहना है कि उसकी सीमा में आने वाली किसी व्यावसायिक संस्था पर कार्रवाई से पहले FDA को बोर्ड को विश्वास में लेना चाहिए था। बोर्ड के अनुसार, यदि दोनों विभागों की संयुक्त कार्रवाई होती तो नियमों का उल्लंघन करने वाले अन्य प्रतिष्ठानों पर भी इसका प्रभाव पड़ता और उन्हें भी स्पष्ट संदेश जाता। हालांकि, FDA की कार्रवाई के बाद यह मामला अब केवल खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गया है। प्रतिष्ठान की अनुमति, लाइसेंस, पार्किंग और अन्य विभागों की NOC को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
अमेरिका में कानूनी जीत, अब अपने ही शहर में विवाद
पुणे का यह ‘बर्गर किंग’ पहले भी चर्चा में रह चुका है। करीब दो साल पहले अमेरिकी ‘Burger King’ के साथ ब्रांड नाम को लेकर चले कानूनी विवाद में पुणे के प्रतिष्ठान ने जीत हासिल की थी। इसके बाद स्थानीय ‘बर्गर किंग’ को लेकर देशभर में चर्चा हुई थी। लेकिन अब FDA की कार्रवाई और कैंटोनमेंट बोर्ड के दावों ने इस प्रतिष्ठान को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। जिस नाम ने कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई थी, वही प्रतिष्ठान अब स्थानीय स्तर पर अनुमति और नियमों के पालन को लेकर सवालों के घेरे में है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना जरूरी अनुमति और NOC के यह प्रतिष्ठान इतने लंबे समय तक कैसे चलता रहा और संबंधित विभागों को इसकी जानकारी कब हुई?


