मुंबई : मुंबई हाईकोर्ट ने जमीन मालिकों के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 के तहत तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना राज्य सरकार किसी भी जमीन को ‘प्राइवेट फॉरेस्ट’ (निजी वन) घोषित नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने ‘महाराष्ट्र प्राइवेट फॉरेस्ट (अधिग्रहण) अधिनियम, 1975’ से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जमीन को निजी वन घोषित करने से पहले जमीन मालिक को नोटिस देना, उसकी आपत्तियां सुनना और उन पर विचार करना अनिवार्य है। इसके बाद ही संबंधित अधिसूचना जारी की जा सकती है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के फैसले के बावजूद सरकार अब भी उसी गलत धारणा पर कायम है कि 30 अगस्त 1975 तक मौजूद हर वनभूमि स्वतः सरकार के कब्जे में चली गई थी। अदालत ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
कोर्ट ने सरकार को ऐसे सभी मामलों की समीक्षा करने और जिन जमीन मालिकों के अधिकार गलत तरीके से प्रभावित हुए हैं, उनके राजस्व रिकॉर्ड (भूमि अभिलेख) को फिर से सही करने का भी निर्देश दिया है। भविष्य में इस तरह के विवाद बार-बार अदालत तक न पहुंचें, इसके लिए हाईकोर्ट ने उप-वन संरक्षक या उससे वरिष्ठ अधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने के आदेश दिए हैं। यह समिति लंबित मामलों की जांच करेगी और जहां कानूनी आधार बनता है, वहां मूल जमीन मालिकों के नाम रिकॉर्ड में बहाल करेगी। हाईकोर्ट का यह फैसला महाराष्ट्र में जमीन और वन अधिकारों से जुड़े कई लंबित मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन जमीन मालिकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जो लंबे समय से अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।


