मदरसों से वैदिक पाठशालाओं तक TET अनिवार्य करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट पहुंची याचिका

धार्मिक शिक्षा देने वाली संस्थाओं में भी योग्य शिक्षकों की नियुक्ति की मांग; समान शिक्षा के अधिकार पर जोर

नागपुर :  देश की शिक्षा व्यवस्था में समानता और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे खान ने मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा देने वाली संस्थाओं में भी शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) अनिवार्य करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

याचिका में मांग की गई है कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों समेत ऐसी सभी संस्थाओं में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए TET की पात्रता जरूरी की जाए। प्यारे खान का कहना है कि किसी संस्था का धार्मिक स्वरूप बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा और समान शैक्षणिक अधिकारों से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता।

RTE से मिली छूट पर सवाल

शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून में 2012 में किए गए संशोधन के तहत मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा देने वाली संस्थाओं को RTE के दायरे से बाहर रखा गया था। याचिका में RTE अधिनियम की धारा 2(n) के तहत दी गई इस छूट की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया है कि इस तरह की छूट से अलग-अलग संस्थाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिए शिक्षा के मानकों में अंतर पैदा हो सकता है। खासकर शिक्षकों की पात्रता के मामले में समान व्यवस्था जरूरी होने की बात कही गई है।

‘धार्मिक शिक्षा’ की परिभाषा पर भी सवाल

याचिका में ‘मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा देने वाली संस्था’ जैसे शब्दों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके स्पष्ट और निश्चित मानदंड नहीं होने से प्रशासनिक स्तर पर अलग-अलग व्याख्या या मनमाने फैसलों की आशंका जताई गई है। प्यारे खान का कहना है कि बच्चों की शिक्षा का स्तर केवल इस आधार पर अलग नहीं होना चाहिए कि वे किस प्रकार की संस्था में पढ़ रहे हैं। हर बच्चे को प्रशिक्षित और योग्य शिक्षक से शिक्षा पाने का समान अवसर मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने मामले से जोड़ा

इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने पहले से लंबित ‘अंजुमन इशाअत-ए-तालीम ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले के साथ जोड़ने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में अब इस मुद्दे पर होने वाली सुनवाई का असर देशभर में धार्मिक और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में शिक्षक पात्रता से जुड़े नियमों पर पड़ सकता है। शिक्षा के अधिकार, धार्मिक संस्थानों की स्वायत्तता और शिक्षकों की योग्यता के बीच संतुलन को लेकर यह मामला आने वाले समय में महत्वपूर्ण हो सकता है।

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