दिवाली का त्योहार रोशनी, खुशियों और आतिशबाजी के लिए जाना जाता है, लेकिन पटाखों से निकलने वाला धुआं और तेज आवाज हर साल पर्यावरण के साथ लोगों की सेहत के लिए भी चिंता का विषय बनते हैं। ऐसे में नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) एक ऐसी पहल पर काम कर रहा है, जिससे दिवाली की खुशियों के बीच प्रदूषण का असर कम किया जा सके।
सीएसआईआर-नीरी के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ग्रीन क्रैकर्स में 12 से 13 नए फॉर्मूलेशन तैयार किए जा रहे हैं। इन नए फॉर्मूलों का उद्देश्य पारंपरिक पटाखों की तुलना में उत्सर्जन को 45 से 60 प्रतिशत तक कम करना है। संस्थान की कोशिश है कि इन नए ग्रीन पटाखों को अगली दिवाली तक बाजार में लाया जा सके।
पहले से ज्यादा प्रभावी होंगे नए ग्रीन पटाखे
नीरी के समन्वयक जोशुआ कृपादम के अनुसार, संस्थान पहले भी ग्रीन पटाखों के फॉर्मूले विकसित कर चुका है, जिनसे उत्सर्जन में लगभग 25 से 30 प्रतिशत तक कमी आती थी। अब नए फॉर्मूलेशन के जरिए इस कमी को बढ़ाकर 45 से 60 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इन पटाखों से निकलने वाला धुआं भी काफी कम या लगभग न के बराबर दिखाई देने की उम्मीद है। हालांकि, ग्रीन पटाखों को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त समझना सही नहीं होगा। इनका उद्देश्य पारंपरिक पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाना है। यानी आतिशबाजी के शौकीनों को पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने का एक बेहतर विकल्प मिल सकता है।
कारीगरों के रोजगार पर भी नीरी का ध्यान
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू उन कारीगरों से भी जुड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी लड़ी वाले पटाखों के कारोबार पर निर्भर रही है। पटाखा बाजार में लड़ी वाले पटाखों की हिस्सेदारी करीब 20 से 30 प्रतिशत मानी जाती है। पिछले 5 से 7 वर्षों में प्रतिबंधों और सख्त नियमों के कारण इस कारोबार से जुड़े कई कारीगरों को रोजगार संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। नीरी की कोशिश है कि पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए लड़ी पटाखों के उत्पादन को बेहतर बनाया जाए। इससे एक ओर प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर इस उद्योग से जुड़े कारीगरों के लिए रोजगार के नए अवसर भी खुल सकते हैं।
1,000 पटाखों की लड़ी के शोर को कम करने पर शोध
सिर्फ धुएं पर ही नहीं, बल्कि पटाखों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण पर भी संस्थान काम कर रहा है। खासकर लड़ी वाले पटाखों से एक साथ होने वाली तेज आवाज लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है। जानकारी के अनुसार, 1,000 पटाखों वाली लड़ी का शोर लगभग 130 से 140 डेसिबल तक पहुंच सकता है, जबकि निर्धारित सीमा 125 डेसिबल है। नीरी इस आवाज को तय मानकों के भीतर लाने के लिए भी अनुसंधान कर रहा है।
कुल मिलाकर, नीरी की यह पहल केवल कम प्रदूषण वाले पटाखे तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए पर्यावरण संरक्षण और कारीगरों के रोजगार, दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। अब देखना होगा कि अनुसंधान में तैयार हो रहे ये नए फॉर्मूले अगली दिवाली तक बाजार में कितनी बड़ी बदलाव की वजह बनते हैं।


