ज्ञानेश्वरी में मन और विचार बदलने की शक्ति, तनाव से मुक्ति का भी संदेश: डॉ. भूषणकुमार उपाध्याय

नागपुर विश्वविद्यालय में ‘ज्ञानेश्वर माऊली विद्वत परिषद 2026’ का आयोजन; संत ज्ञानेश्वर के विचारों को आधुनिक जीवन से जोड़ने पर मंथन

नागपुर : संत ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मनुष्य के मन, भावनाओं और विचारों को नई दिशा देने वाली जीवनदृष्टि है। ज्ञानेश्वरी में व्यक्ति को तनाव से बाहर निकालने और जीवन को सकारात्मक तरीके से देखने की शक्ति है। यह विचार लेखक, चिंतक और सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक डॉ. भूषणकुमार उपाध्याय ने व्यक्त किए।

संत ज्ञानेश्वर माऊली की 750वीं जयंती वर्ष के अवसर पर महाराष्ट्र शासन के सांस्कृतिक कार्य विभाग, सांस्कृतिक कार्य संचालनालय और राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ‘ज्ञानेश्वर माऊली विद्वत परिषद 2026’ का आयोजन किया गया। सोमवार, 31 अगस्त को अंबाझरी मार्ग स्थित गुरुनानक भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में संत ज्ञानेश्वर के विचारों, साहित्य और मानवतावादी दृष्टिकोण पर विभिन्न सत्रों में चर्चा हुई।

युवाओं के तनाव पर जताई चिंता

कार्यक्रम में डॉ. उपाध्याय ने कहा कि आज भविष्य, शिक्षा, रोजगार, पैसा, सुविधाओं और रहने जैसी अनेक चिंताओं के कारण समाज तनाव से गुजर रहा है। खासकर युवाओं में बढ़ता मानसिक तनाव गंभीर विषय है। यदि युवा पीढ़ी को तनाव से मुक्त नहीं किया गया तो विकास का वास्तविक लाभ समाज तक नहीं पहुंच पाएगा। उन्होंने कहा कि संत ज्ञानेश्वर ने करीब 750 वर्ष पहले ही मन और भावनाओं से जुड़े कई पहलुओं पर विचार किया था। भगवद्गीता में अर्जुन के मन की अस्थिरता और श्रीकृष्ण द्वारा ज्ञान तथा वैराग्य के माध्यम से मन पर नियंत्रण पाने का संदेश आज भी प्रासंगिक है।

डॉ. उपाध्याय ने कहा कि संत ज्ञानेश्वर के विचारों को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि मनोविज्ञान और आधुनिक जीवन के संदर्भ में भी समझने की जरूरत है। ज्ञानेश्वरी के शब्दों और उसके विचारों में मन को शांत करने की क्षमता है। तनाव की स्थिति में आध्यात्मिक साहित्य का अध्ययन व्यक्ति को मानसिक शांति दे सकता है।

कैदियों में भी दिखा धार्मिक ग्रंथों का असर

डॉ. उपाध्याय ने अपने प्रशासनिक अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि महाराष्ट्र में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कारागृह) के रूप में कार्य करते समय कैदियों में धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन की आदत विकसित करने का प्रयास किया गया। इसके बाद कैदियों में हिंसक व्यवहार में कमी देखने को मिली। उन्होंने कहा कि संत ज्ञानेश्वर का दर्शन केवल किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण का संदेश देता है। माहिती में विवेक जुड़ने से ज्ञान और ज्ञान में करुणा जुड़ने से मानवता का निर्माण होता है।

योग और प्राणायाम के माध्यम से तनाव कम करने पर दुनिया में शोध हो रहा है। डॉ. उपाध्याय के अनुसार, ज्ञानेश्वरी में भी सदियों पहले प्राणायाम और मन को नियंत्रित करने से जुड़े विचार मिलते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ज्ञानेश्वरी का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो रहा है और इसके विचारों को आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में भी समझने का प्रयास किया जा रहा है।

‘ज्ञानेश्वर माऊली के कार्यों से मिलते हैं जीवन के उत्तर’

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए विश्वविद्यालय के प्र-कुलगुरु डॉ. अखिलेश पेशवे ने कहा कि जीवन में आने वाली समस्याओं का सामना कैसे करना है, अपमान को कैसे सहना है, लक्ष्य को कैसे हासिल करना है और कठिन परिस्थितियों में भी काम करते रहना कैसे संभव है—इन सवालों के जवाब संत ज्ञानेश्वर के जीवन और कार्य से मिलते हैं। उन्होंने कहा कि संत ज्ञानेश्वर की 750वीं जयंती के अवसर पर आयोजित यह विद्वत परिषद संत परंपरा के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

ज्ञानेश्वरी में गीता का सार

पहले सत्र में डॉ. राजेंद्र नाईकवाडे ने ‘ज्ञानदेवे रचिला पाया’ विषय पर विचार रखे। उन्होंने संत ज्ञानदेव को मराठी संस्कृति के महत्वपूर्ण आधारस्तंभों में से एक बताते हुए कहा कि उनके विचार आज भी समाज को प्रेरणा देते हैं। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर को मराठी भाषा के आद्य कवि, गीता के भाष्यकार और वारकरी परंपरा के प्रमुख आधार के रूप में प्रस्तुत किया।

वहीं, आशुतोष अडोणी ने ‘ज्ञानेश्वरीचे आधुनिक अनुबंध’ विषय पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि संत ज्ञानेश्वर के विचारों को आज के एआई और तकनीक के दौर से भी जोड़ा जा सकता है। आधुनिक युवा जिस अस्थिरता और सवालों से गुजर रहा है, उसके कई उत्तर ज्ञानेश्वरी में मिल सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन-दर्शन और भगवद्गीता के सार को संत ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी के माध्यम से सरल भाषा में समाज तक पहुंचाया।

मानवतावाद और विश्वबंधुत्व पर भी चर्चा

दूसरे सत्र में डॉ. माया पराते-रंभाडे ने ‘संत ज्ञानदेवाचे प्रभावक्षेत्र’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि संत ज्ञानेश्वर का प्रभाव केवल वारकरी संप्रदाय या तत्कालीन संत परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके विचार आज भी आम व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं। प्राचार्य डॉ. अरविंद देशमुख ने ‘ज्ञानेश्वरांचे अध्यात्म आणि मानवतावाद’ विषय पर चर्चा की। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर के अध्यात्म, मानवतावाद, मन की एकाग्रता और जीवन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। साथ ही विश्वबंधुत्व की उनकी मानवतावादी सोच को आज के समय के लिए महत्वपूर्ण बताया।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय सेवा योजना संचालक डॉ. सोपानदेव पिसे, आजीवन अध्ययन एवं विस्तार विभाग के संचालक डॉ. समित माहोरे सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न प्राधिकरणों के सदस्य, विभाग प्रमुख, शिक्षक, विद्यार्थी, राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी और स्वयंसेवक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अमृता इंदूरकर ने किया। दोनों सत्रों का संचालन एवं आभार प्रदर्शन राष्ट्रीय सेवा योजना विभागीय समन्वयक डॉ. संजय सिंगनजुडे ने किया।

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