नागपुर : नागपुर की ऐतिहासिक दीक्षाभूमि एक बार फिर बुद्धमय हो उठी। नीले झंडों, बुद्ध वंदना और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से गूंजते परिसर में 70वें धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर देश-विदेश से लाखों अनुयायी पहुंचे। हर तरफ श्रद्धा, समानता और सामाजिक न्याय का संदेश दिखाई दिया। अनुयायियों ने तथागत गौतम बुद्ध और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को नमन करते हुए उनके विचारों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। इस वर्ष दीक्षाभूमि पर सामान्य वर्षों की तुलना में दोगुने से भी अधिक अनुयायियों की भीड़ दिखाई देने का दावा किया गया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने इसी ऐतिहासिक भूमि पर बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर सामाजिक परिवर्तन की एक नई राह दिखाई थी। आज भी यह स्थान लाखों लोगों के लिए केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि समानता, स्वतंत्रता, न्याय और आत्मसम्मान की प्रेरणा है। इसी भावना के बीच मंगलवार को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्मारक समिति की ओर से 70वें धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस का आयोजन किया गया।
दीक्षाभूमि को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की जरूरत
कार्यक्रम में फ्रांस स्थित प्राकुंट बुद्धिस्ट अकादमी के अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध धम्म प्रचारक भदंत डॉ. टी. धम्म रतन ने दीक्षाभूमि के ऐतिहासिक महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने वाला यह स्थान स्वतंत्रता, विजय और मानवीय न्याय का प्रतीक है। मानवता के इतिहास में दीक्षाभूमि को उसका उचित स्थान मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बौद्ध धम्म अब केवल एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इसे स्वीकार किया जा रहा है। ऐसे में भारतीय बौद्धों और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध समुदाय के बीच समन्वय बढ़ाना जरूरी है। भारतीय बौद्धों को दुनिया भर के बौद्ध समुदाय से जुड़ने और आपसी संबंध मजबूत करने की दिशा में काम करना चाहिए।
बाबासाहेब के विचार केवल भाषणों तक सीमित न रहें
म्यांमार से आए भदंत वन्ना सिरी महाथेरो ने कहा कि बौद्ध धम्म का सम्मान केवल घोषणाओं, प्रतिमाओं और माल्यार्पण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को अपने व्यवहार और जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्चा सम्मान है। उन्होंने शिक्षा, बौद्ध प्रशिक्षण संस्थानों और पुस्तकों के माध्यम से धम्म का प्रसार करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि बाबासाहेब के विचारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए केवल स्मरण करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन पर अमल करना भी जरूरी है।
दीक्षाभूमि के विकास के लिए 991 करोड़ रुपये की मांग
धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के अवसर पर दीक्षाभूमि के विकास का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। अधिवक्ता शैलेश नारनवरे ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ में दायर जनहित याचिका का उल्लेख करते हुए विकास परियोजना की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि दीक्षाभूमि के विकास के लिए 991 करोड़ रुपये की परियोजना प्रस्तावित है, जिसे चार चरणों में पूरा किया जाना है। उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से इस परियोजना के लिए प्रस्तावित राशि को जल्द मंजूरी देने की मांग की। दीक्षाभूमि देश-विदेश से आने वाले अनुयायियों के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में इसके विकास और आवश्यक सुविधाओं को लेकर उठी यह मांग भी कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
बौद्धों के लिए अलग व्यक्तिगत कानून की मांग
दिल्ली से आए भंते करुणाकरण ने महाबोधि महाविहार को बौद्धों के नियंत्रण में सौंपने की मांग उठाई। उन्होंने बौद्ध समुदाय के लिए अलग व्यक्तिगत कानून बनाने की आवश्यकता भी व्यक्त की। उनके अनुसार, ऐसा कानून बनने से महाबोधि विहार को बौद्धों के नियंत्रण में सौंपने की मांग को मजबूती मिल सकती है। वहीं, भंते ठाकपा जिंगपा ने कहा कि तथागत गौतम बुद्ध और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को जीवन में अपनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्होंने बौद्ध धम्म को किसी एक देश तक सीमित न मानते हुए इसे संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग बताया।
देश-विदेश से पहुंचे अनुयायियों से गुलजार हुई दीक्षाभूमि
इस आयोजन की अध्यक्षता स्मारक समिति के अध्यक्ष भदंत आर्य नागार्जुन सुरई ससाई ने की। कार्यक्रम में म्यांमार के भदंत वन्ना सिरी महाथेरो सहित विभिन्न देशों और राज्यों से आए बौद्ध भिक्खु, प्रतिनिधि और कई क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। समिति के सचिव सुधीर फुलझेले, अधिवक्ता आनंद फुलझेले और अन्य अतिथियों ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की।
धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के अवसर पर नागपुर की सड़कों से लेकर दीक्षाभूमि परिसर तक अनुयायियों की बड़ी मौजूदगी दिखाई दी। दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचे लोगों के लिए यह दिन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपने इतिहास, अधिकारों और सामाजिक परिवर्तन की विरासत से जुड़ने का अवसर भी रहा। 70वें धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर दीक्षाभूमि में उमड़ी भीड़ ने एक बार फिर यह दिखाया कि बुद्ध और बाबासाहेब के विचार आज भी लाखों लोगों के जीवन में गहरा स्थान रखते हैं। अब सबकी निगाहें दीक्षाभूमि के विकास के लिए प्रस्तावित 991 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी मिलने पर भी टिकी हैं।


