El Niño 2026: दिसंबर में बढ़ेगी गर्मी? भारत में सूखे से बाढ़ तक का खतरा!

चार दशकों की सबसे तीव्र स्थिति की आशंका, बारिश में बदलाव से खेती और जलसंकट पर पड़ सकता है असर

दुनिया के मौसम में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इस बार इसकी वजह बन रहा है El Niño, जिसका असर भारत के तापमान और बारिश के पैटर्न पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच इसकी स्थिति अधिक मजबूत हो सकती है। ऐसे में दिसंबर में गर्मी बढ़ने और दक्षिण भारत में बारिश कम होने की आशंका ने चिंता बढ़ा दी है। इसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसानों की फसलों, पानी की उपलब्धता और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ सकता है।

क्या El Niño तोड़ेगा चार दशकों का रिकॉर्ड?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के ताजा मौसमी आकलन के अनुसार, नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के दौरान अल नीनो से जुड़ी समुद्र की सतह का तापमान औसत से लगभग 3.8 डिग्री सेल्सियस तक अधिक होने की संभावना जताई गई है। दिसंबर में यह स्थिति अपने चरम पर पहुंच सकती है। WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने भी इस संभावित स्थिति को लेकर चिंता जताई है। आकलन के मुताबिक, अल नीनो की तीव्रता पिछले चार दशकों के निगरानी मानकों को पीछे छोड़ सकती है। हालांकि, इसके वास्तविक प्रभाव कितने गंभीर होंगे, यह आने वाले समय के मौसम संबंधी आकलन पर निर्भर करेगा।

भारत में कहीं गर्मी, तो कहीं बारिश की कमी की चिंता

अल नीनो का असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में दिखाई दे सकता है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम होने की आशंका है। वहीं, दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य या उससे ज्यादा रह सकता है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां खेती का बड़ा हिस्सा बारिश पर निर्भर करता है। अगर तापमान बढ़ता है और बारिश का पैटर्न बदलता है, तो फसलों की पैदावार, सिंचाई और जलस्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर आगे चलकर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।

दक्षिण भारत की खेती पर पड़ सकता है असर

दक्षिण भारत में अक्टूबर से दिसंबर के बीच होने वाली बारिश खेती और जलाशयों को पानी उपलब्ध कराने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसे पूर्वोत्तर मानसून कहा जाता है।

15 अक्टूबर को दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के साथ ही दक्षिण भारत में पूर्वोत्तर मानसून की शुरुआत हुई। ऐसे में अगर अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है और बारिश सामान्य से कम होती है, तो किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जलाशयों में पानी का स्तर प्रभावित होने की आशंका भी बनी रह सकती है। हालांकि, अभी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि भारत में कितनी बारिश कम होगी या किन राज्यों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। इसके लिए आने वाले मौसम पूर्वानुमानों पर नजर रखना जरूरी होगा।

आम लोगों को क्यों सतर्क रहने की जरूरत है?

मौसम में होने वाले बदलावों का असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहता। तापमान बढ़ने पर गर्मी और पानी की मांग बढ़ सकती है। वहीं, बारिश में कमी आने से खेती और जलापूर्ति प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय मौसम प्रणालियों के कारण भारी बारिश और बाढ़ जैसी घटनाएं भी हो सकती हैं। हालांकि, केवल अल नीनो के आधार पर किसी खास क्षेत्र में बाढ़ आने की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने यह भी स्पष्ट किया है कि अल नीनो की तीव्र स्थिति का मतलब अपने आप किसी बड़े मानवीय संकट से नहीं है। समय पर मौसम का पूर्वानुमान, शुरुआती चेतावनी और जरूरी तैयारियों से संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है। फिलहाल, दिसंबर 2026 के मौसम को लेकर आने वाले पूर्वानुमान काफी अहम होंगे। किसानों से लेकर आम नागरिकों तक, सभी के लिए जरूरी है कि वे मौसम संबंधी आधिकारिक जानकारियों पर नजर रखें। क्योंकि मौसम का यह बदलाव कितना असर डालेगा, इसका जवाब आने वाले महीनों में ही स्पष्ट हो पाएगा।

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