मंजुषा विश्र्वेकर ✍️
“जब ज़िद पे आ गई पार्वती”
“जब जिद पे आई पार्वती “यह गाना आप सबने सुना ही होगा l बहुत ही मधुर और दिल की छू लेनेवाला यह गीत अपने आप में एक कथा सुनाता है l
शिव और शक्ति के इर्द-गिर्द घूमने वाली यह सारी कथाएं है। सती कहे या पार्वती एक शक्ति स्वरूपिणी देवी जब असुरों का सर्वनाश करती है तो किस तरह विविध रूप धारण कर लेती है।
आज देखते है ,नवरात्रि की तीसरी माला , देवी चंद्रघंटा की कथा l
पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था, तब भगवान शिव अत्यंत शोक में डूब गए और गहरे ध्यान में चले गए। इसके बाद देवी सती ने पर्वतराज हिमालय और रानी मैनावती के यहां पार्वती के रूप में जन्म लिया।
भगवान शिव को पुनः पति के रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने अत्यंत कठिन तपस्या की। पार्वती की इस कठोर तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनसे विवाह करने के लिए सहमत हो गए।
जब भगवान शिव बारात लेकर पार्वती के घर पहुंचे, तो उनका रूप अत्यंत भयानक था—उनके शरीर पर भस्म लगा था, जटाएं बढ़ी थीं और गले में सांप व खोपड़ियों की माला थी। उनके साथ गण,भूतों, प्रेतों और अघोरियों की बारात देखकर पार्वती के माता-पिता और संबंधी भयभीत हो गए। हिमालय ने सप्त ऋषियों को आमंत्रित किया कहा कि पार्वती को समझाएं मैंने उनके लिए बहुत ही अच्छा और सुंदर व ढूंढ लिया है जो विष्णु जी है। अब पार्वती तो पार्वती है इतना समझाने के बाद भी वह अपने निर्णय पर अटल रही।
अपने माता पिता और संबंधियों की घबराहट को देखकर, माता पार्वती ने तब मां चंद्रघंटा का रौद्र व भव्य रूप धारण किया। उनके इस रूप को देखकर भगवान शिव ने अपनी वेशभूषा बदली और एक सुंदर, आभूषणों से सुसज्जित राजकुमार का रूप धारण किया। इसके बाद माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह संपन्न हुआ। दोनों आनंद दाई और सुख में जीवन कैलाश में व्यतीत करने लगे। पर क्या विपत्तियां कम होती है। महिषासुर नाम का असुर ने तीनों लोकों में त्राहि त्राहि मचा के रखी थी। चलिए देखते हैं चंद्रघंटा का और एक रूप जिन्हें
महिषासुर मर्दिनी भी कहते है।
पुराणों में जिस कथा का जिक्र है उसके मुताबिक देव लोक में जब असुरों का आतंक अधिक बढ़ गया तो देवी दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार लियाl उस वक्त महिषासुर असुरों का स्वामी था।ये दुत्कारी महिष देवराज इंद्र का सिंहासन पाना चाहता था।स्वर्गलोक पर राज करने की अपनी इच्छा को साकार करने हेतु वो सारे तरीके अपनाता था।
जब देवगणों को उसकी ये इच्छा ज्ञात हुई तो वो चिंतित होकर त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे।देवताओं के मुख से महिषासुर के अत्याचार को जानने के बाद तीनों अत्यंत क्रोधित हुए। उसी वक्त उनके मुख से उत्पन्न ऊर्जा से देवी का अवतरण हुआ। देवी को भगवान विष्णु ने चक्र प्रदान किया,वहीं शिव जी ने अपना त्रिशूल तो ब्रह्मा ने अपना कमंडल दिया।इस प्रकार सभी देवताओं ने देवी को कुछ-न-कुछ भेंट किया।
जिसके बाद आज्ञा पाकर देवी चंद्रघंटा महिषासुर के पास गई. माता का विशालकाय स्वरूप देखकर दैत्य महिषासुर इस बात को भांप चुका था कि अब उसका अंत निश्चय है। बावजूद इसके, असुर ने मां चंद्रघंटा पर हमला करना शुरू कर दिया।भयंकर युद्ध में महिषासुर काल के समा गया और देवी ने सभी देवताओं की रक्षा की.
नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा-आराधना की जाती है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करनी चाहिए l इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इसीलिए इस देवी को चंद्रघंटा कहा गया है।
इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी के दस हाथ हैं। वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं।
सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने की है। इसके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस कांपते रहते हैं।
इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं।
ऐसा कहा जाता है।
इसलिए हमें चाहिए कि मन, वचन और कर्म से उपासना-आराधना करनी चाहिए। इससे सारे कष्टों से मुक्त हो जाते है।
माता को केसर डली गाय के दूध से बनी खीर अत्यंत प्रिय है।
इनके भोग में पंचामृत और मिश्री
शामिल की जा सकती है।
मां को पीले और लाल रंग के पुष्प (विशेषकर गुड़हल) जिसे हम जास्वंद भी कहते है, बहुत पसंद हैं।
मां का स्तुति मंत्र इसप्रकार है।
“या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः”
इस वर्ष माँ लाल रंग वस्त्र धारण करके आई है।लाल रंग ऊर्जा, उत्साह, साहस, प्रेम और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसका महत्व धार्मिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत अधिक है।
हिंदू धर्म में लाल रंग को सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। विवाहित महिलाएं लाल रंग की साड़ी और लाल सिंदूर लगाती हैं।
यह माता लक्ष्मी और हनुमान जी का प्रिय रंग माना गया है। मां लक्ष्मी लाल वस्त्र धारण करती हैं और लाल कमल पर विराजमान होती हैं। पूजा-पाठ और शुभ कार्यों में लाल कपड़े का विशेष रूप से उपयोग होता है।
ज्योतिष शास्त्र में लाल रंग को मंगल ग्रह, अग्नि और रक्त का प्रतीक कहा गया है। यह साहस, शक्ति और दृढ़ संकल्प बढ़ाता है।
मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रभाव
लाल रंग की लहरे तरंग (wavelength) सबसे लंबी होती है, जिससे यह दूर से ही तुरंत ध्यान खींचता है। इसी वजह से इसका उपयोग खतरे के संकेत, ट्रैफिक सिग्नल, स्टॉप बोर्ड और आपातकालीन वाहनों में भी किया जाता है।
विज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने से,
यह शरीर में रक्त संचार, चयापचय (metabolism) और स्फूर्ति को बढ़ाता है। आलसी स्वभाव वाले लोगों के लिए यह ऊर्जादायक होता है।
अत्यधिक लाल रंग का प्रयोग या संपर्क मन में उग्रता, गुस्सा और बेचैनी भी बढ़ा सकता है। इसलिए उच्च रक्तचाप (high BP) या अत्यधिक क्रोध वाले लोगों को इसका प्रयोग सीमित करने की सलाह दी जाती है।
चलिए देखते है एक कविता।।
देवी चंद्रघंटा ( तृतीय दिवस)
देवी चंद्रघंटा आयी
शेर पर बैठकर
रक्तिम लाल वस्त्र
परिधान करकर ll
अर्धचंद्र धारिणी
हाथ में खड्ग,शर
युद्ध के लिए तत्पर
लक्ष्य असुरोपर ll
करो हृदय से पूजा
मन मणिपूर चक्री
साधक को मिलती
सुख, शांती, समृद्धी ll
घंटा नाद मधुर ध्वनि
दूध खीर भोग चढ़े
अर्पित हो सुगंधी पुष्प
माता की भक्ति बढ़े ll
ऐसी है कल्याणी मां
मंगल कामना देवी
भक्तोंपर सदोदित
कृपादृष्टी रखती ll



