हर्षा हरीश वाघमारे ✍️
शारदीय नवरात्री की शुरुवात अश्र्विन शुध्द प्रतिपदा से होती हैं ! नौ दीन देवी के नौ रुप होते हैं! प्रथम शैलपुत्रींच, व्दितीय ब्रम्हचारिणी,
तृतीयं चंद्रघण्टेती,कुण्मांडेति
चतुर्थकम् , पंचंम् स्कंदमातेति, षष्ठं कात्यायनीतिचं, सप्तंमम्
कालरात्रीति, महागौरीति
चाष्टमम् ,नवमं सिध्दीदात्रींच, नवदुर्गा:
प्रक्रिर्तीता:
इसीतरह नौ नाम से दुर्गा प्रसिद्ध हैं ! ये सब नाम
ब्रम्हदेव ने दुर्गा माता को दिये हैं !
आज नवरात्री का चौथा दिन याने मां कुष्मांडा, आदी शक्ती मां दुर्गा का यह स्वरूप हैं ! मां कुष्मांडा ने धुमोलोचन का संहार
किया धुमलोचन का अर्थ
हैं, धुयें जैसी धुंधली दृष्टी आज हमारे भितर
असूर पुर्वग्रह सुनी सुनायें बातें हैं! जब सत्य साफ दिखाई नहीं देता,तो जीवन में गलत निर्णय होते हैं! कुष्मांडा मां की उर्जा हमें स्पष्ट विवेक देती हैं!किसी भी बात को
हमें तर्क और तथ्थ की कसौटी पर कसना हो,तो
इस धुंध को छाटना हैं!
देवी नवरात्री के चौथे दीन
मां कुष्मांडा की पुजा की जाती हैं! कुष्मांडा का अर्थ हैं, कुका याने की छोटा, उष्मा का अर्थ हैं गर्मी या उर्जा और अंडा का अर्थ हैं, ब्रम्हांड, याने की अपने शक्ती से संपूर्ण
ब्रम्हांड का निर्माण किया है! और उसका आकार अंडाकार हैं! याने कुष्मांडा देवी का स्वरूप!
कहते हैं,की जब सृष्टी का निर्माण नहीं हुआ था, चारोंतरफ अंधेरा था, तब केवल शुन्य ही था! सिर्फ शुन्यता और अंधेरा छाया था!!
पौराणिक कथेअनुसार ऐसी ही मान्यता थी!
मंद मुस्कान और प्रकाश
तब आदी शक्ती मां कुष्मांडा ने अपनी मंद मंद मुस्कान से ब्रम्हांड की रचना की,एक दिव्य हास्य से चारों और प्रकाश निर्माण किया!
दिव्य उर्जा फैला दी!
उसके बाद मां कुष्मांडा ने
अपने आपको सुर्य मंडल के भितर स्थापित किया!
क्योंकी सुर्य के तेज किरणोंको सहन करने और उसे नियंत्रित करनेकी क्षमता सिर्फ मां कुष्मांडा में थी! उनके
शरिर की कांती और चेहरे का तेज भी सुर्य समान तेजस्वी दिखाई देता हैं!
कुष्मांडा दैदिप्यमान हैं !
सृष्टी का विस्तार करने के
बाद मां कुष्मांडा ने ब्रम्हा विष्णु महेश (शिव) इन
तीनों देवों की रचना की,
और उन्हें सृष्टीका कार्य
याने सृजन,पालन,और संहार ये तीनों कार्य सौंप
दिया! उसके बाद उन्होंने
नौ ग्रह और समस्त जीवों की उत्पत्ती की!
मां कुष्मांडा के आठ भुजा हैं, इसिलीए उन्हें
अष्टभुजा देवी भी कहते हैं! ऎसी आठ भुजा वाली
कुष्मांडा देवी ने सात हाथों में निम्मलिखीत दिव्य वस्तुओंको सप्तभुजा में धारण किया हैं! जैसे …. कमंडलू,बाण,कमल का फुलं, धनुष्य, चक्र और गदा,आठवे हाथों में सभी
सिध्दीयों और निधीयों को
देने वाली जपमाला हैं!
माता सिंह या शेर पर सवार होती हैं,जो धर्म और साहस का प्रतिक हैं!
कलीयुग में आजकल मां को नौ दीन नवरात्री उत्सव में साडीयों के रंग दिये जाते हैं! पहिले ऐसा नहीं था!
आज का रंग निला हैं !
निला रंग मुख्य रुप से
शांती, विश्वास, बुध्दीमत्ता
और स्थिरता का प्रतिक
माना जाता हैं! यह मन को शांत करता हैं और
तनाव कम करता हैं! यह
विश्वासनियता, सुरक्षा और जिम्मेदारी निभाता हैं! प्रकृती में यह अनंत
आकाश और समुंदर का
विशाल काम करता हैं!
उसी प्रकार हमारे भारतीय तिरंगे में निले रंग से बना अशोक चक्र हैं! निला रंग सार्वभौमिक
सत्य और आकाश महासागर को दर्शाता हैं!



