नागपुर : जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और खिलौने होने चाहिए, उसी उम्र में कई मासूमों के हाथों में मजदूरी थमा दी जाती है। घर में दो वक्त की रोटी का इंतजाम मुश्किल होने पर गरीब माता-पिता जब अपने बच्चे को किसी दलाल के साथ शहर भेजते हैं, तो उनके मन में एक ही उम्मीद होती है—बच्चा पढ़ेगा, कुछ कमाएगा और परिवार की हालत सुधरेगी। लेकिन कई मामलों में यही उम्मीद बच्चों को शोषण की ऐसी दुनिया में पहुंचा देती है, जहां उनके बचपन और भावनाओं दोनों का सौदा होता है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, असम, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के दूरदराज इलाकों से बच्चों को नागपुर समेत दूसरे शहरों में लाए जाने का मामला बेहद गंभीर है। लंबे समय से बाल तस्करी और बाल मजदूरी का यह नेटवर्क अलग-अलग स्तर पर सक्रिय होने की बात सामने आती रही है। रेलवे स्टेशन से लेकर कारखानों और कंपनियों तक कार्रवाई के दौरान 50 से अधिक बच्चों के प्रशासन के हाथ लगने की जानकारी सामने आई है।
खिड़की से बाहर देखते बच्चे, सामने होता है अनजान भविष्य
गांव से शहर की ओर जाने वाली ट्रेन में बैठा बच्चा शायद यही सोचता है कि अब उसकी जिंदगी बदलने वाली है। उसे बताया जाता है कि शहर में पढ़ाई होगी, रहने की अच्छी व्यवस्था होगी और हर महीने घर पैसे भेजे जाएंगे। लेकिन कई बार स्टेशन पर उतरते ही यह सपना टूट जाता है। बच्चों को लेबर कॉन्ट्रैक्टर या अन्य लोगों के हवाले कर दिया जाता है। इसके बाद उनकी जिंदगी स्कूल और खेल के मैदान से निकलकर काम की जगह तक सीमित हो जाती है। कई बच्चों से भारी और जोखिम भरे काम कराए जाने की बात सामने आई है।
आधार कार्ड के नाम पर पहचान पर कब्जा
इस पूरे खेल में बच्चों की पहचान भी एक अहम हिस्सा बन जाती है। दलाल पढ़ाई या नौकरी के नाम पर बच्चों के आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज अपने पास ले लेते हैं। शहर पहुंचने के बाद कई बच्चों की वास्तविक पहचान छिपाने या बदलने की कोशिश की जाती है। काम की जगह पर उन्हें दूसरे लोगों से बातचीत करने से रोका जाता है। कई बार बाहर आने-जाने पर भी पाबंदी रहती है। जब तक बच्चे के भाग जाने का डर खत्म नहीं होता, तब तक उसे काम की जगह के आसपास ही सीमित रखा जाता है। इस तरह मासूम उम्र में ही बच्चे वेठबिगारी जैसे हालात में फंस जाते हैं।
घरवालों तक पहुंचता है पैसा, लेकिन बच्चे का बचपन छिन जाता है
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि माता-पिता को लगता है कि उनका बच्चा शहर में कमाकर परिवार की मदद कर रहा है। दलाल कई बार घरवालों को हर महीने कुछ पैसे भेजते हैं। गरीब परिवार के लिए यह रकम बड़ी मदद लगती है। लेकिन उस पैसे के पीछे उनके बच्चे की मेहनत, मजबूरी और छिनता हुआ बचपन छिपा होता है। जिस बच्चे के भविष्य के लिए माता-पिता ने उसे शहर भेजा था, वही बच्चा अपने भविष्य से दूर होता चला जाता है।
प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल
बाल मजदूरी और बच्चों के शोषण की तस्वीर सामने आने के बावजूद कार्रवाई की गति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कारखानों और अन्य जगहों पर बच्चों से काम कराए जाने की जानकारी होने के बाद भी ऐसे मामलों पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लग पा रही, यह बड़ा सवाल है। आजादी के 75 साल बाद भी अगर किसी बच्चे को सिर्फ परिवार की आर्थिक मजबूरी के कारण पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करनी पड़े, तो यह केवल उस परिवार की समस्या नहीं है। यह व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है। बचपन किसी सौदे का हिस्सा नहीं हो सकता। जिस हाथ में किताब होनी चाहिए, अगर उसी हाथ में मजदूरी का बोझ आ जाए, तो विकास के हर दावे पर सवाल खड़ा होता है।


