शहर के किनारे एक छोटी-सी बच्ची रहती थी—मीरा। मीरा को चीजें जमा करने का बहुत शौक था। कोई रंगीन पत्ता, चमकता पत्थर या छोटी-सी सीप दिखती, तो वह उसे अपनी जेब में रख लेती। एक दिन उसे रास्ते में एक बिल्कुल अलग तरह का पत्थर मिला। वह पत्थर बहुत छोटा था और उसके अंदर पानी की बूंद जैसी चमक दिखाई दे रही थी।
मीरा ने उसे जेब में रखा और घर चली गई।
रात को अचानक उसकी जेब से टप… टप… टप… की आवाज आने लगी।
मीरा ने जेब में हाथ डाला तो उसकी हथेली पर तीन छोटी-छोटी पानी की बूंदें थीं।
अगली सुबह उसने देखा कि घर के सामने लगा सूखा पौधा थोड़ा हरा हो गया है।
मीरा हैरान रह गई।
उसने उस पौधे की मिट्टी में अपनी हथेली की एक बूंद गिराई। कुछ ही देर में मिट्टी से एक नन्ही हरी कोंपल बाहर आ गई।
अब मीरा को समझ आया—उसकी जेब में कोई साधारण पत्थर नहीं था। उसमें बारिश की छोटी-सी बूंदें छिपी थीं।
लेकिन उस दिन शहर में बहुत गर्मी थी। पार्क के सारे पेड़ मुरझा रहे थे और पास की छोटी झील भी लगभग सूख चुकी थी।
मीरा चाहती तो उन बूंदों को अपने पौधों के लिए बचाकर रख सकती थी।
लेकिन वह पार्क चली गई।
उसने अपनी जेब की सारी बूंदें सूखी मिट्टी पर गिरा दीं।
कुछ नहीं हुआ।
मीरा उदास होकर वापस जाने लगी।
तभी हवा चली।
सूखे पेड़ों की पत्तियां हिलने लगीं। आसमान में एक छोटा-सा बादल आया और धीरे-धीरे बड़ा होता गया।
फिर…
टप!
एक बूंद गिरी।
फिर दूसरी।
और देखते ही देखते पूरे शहर में बारिश होने लगी।
मीरा मुस्कुराई।
उसने अपनी जेब देखी। वह पत्थर अब बिल्कुल खाली था।
लेकिन उसकी जगह जेब में एक नन्हा-सा हरा पत्ता पड़ा था।
मीरा ने उसे अपनी किताब में संभालकर रख लिया।
उस दिन से जब भी कोई बच्चा उससे पूछता, “तुम्हारी जेब में क्या है?”
मीरा मुस्कुराकर कहती—
“एक ऐसी चीज, जो तभी बड़ी होती है… जब उसे किसी के साथ बांटा जाए।”
कहानी का संदेश : छोटी-सी चीज भी किसी के लिए बड़ी उम्मीद बन सकती है, अगर हम उसे अपने तक सीमित न रखें।


