नागपुर : विदर्भ के लिए इस साल का मानसून राहत से ज्यादा चिंता लेकर आया है। करीब 18 साल बाद पहली बार पूरे क्षेत्र में औसत से कम बारिश दर्ज की गई है। चार महीने के मानसून सीजन में विदर्भ के 11 जिलों में कुल 687 मिमी बारिश हुई, जबकि औसत बारिश 937 मिमी मानी जाती है। यानी इस बार बारिश में करीब 26 फीसदी की कमी रही।
कम बारिश का असर अब सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में नदी-नाले पूरी तरह नहीं भर पाए, जबकि कुओं के जलस्तर में भी गिरावट दर्ज हुई है। ऐसे में किसानों के साथ आम लोगों की चिंता भी बढ़ गई है कि आने वाली गर्मियों में पानी की स्थिति कैसी होगी।
2009 के बाद पहली बार इतनी कमी
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 18 वर्षों में पहली बार विदर्भ में इतनी कम बारिश हुई है। इससे पहले 2009 में 654.2 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। वहीं 1901 से 2026 के बीच सबसे कम बारिश 1920 में 534.5 मिमी दर्ज हुई थी। इस साल जिलों की स्थिति देखें तो अकोला में सबसे कम 407 मिमी बारिश हुई। वहीं गोंदिया में 1206 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो उसके औसत 1204 मिमी के लगभग बराबर है। अमरावती में बारिश की कमी 42 फीसदी, अकोला में 41 फीसदी, वर्धा में 34 फीसदी, नागपुर और चंद्रपुर में 33 फीसदी तथा वाशिम में 36 फीसदी रही। अमरावती, अकोला, वाशिम, वर्धा, चंद्रपुर और नागपुर में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बताई जा रही है।
जुलाई में बारिश, फिर लंबा ब्रेक
इस बार मानसून ने जून में देर से दस्तक दी। इसके बाद जुलाई में अच्छी बारिश हुई, लेकिन अगस्त और सितंबर में बारिश ने साथ नहीं दिया। बीच में करीब तीन सप्ताह का लंबा ब्रेक भी पड़ा। इसका सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ा और अब रबी फसलों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। किसानों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि खेतों में नमी कम होने के साथ जलस्रोत भी पर्याप्त नहीं भर पाए हैं। बारिश की कमी का असर आने वाले फसल चक्र पर भी पड़ सकता है।
अल-नीनो का भी असर
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, इस साल मानसून पर अल-नीनो का प्रभाव रहा। बंगाल की खाड़ी में तो कई बार कम दबाव की प्रणालियां बनीं, लेकिन अरब सागर में ऐसी कोई मजबूत प्रणाली नहीं बन पाई। इसका असर विदर्भ में बारिश के वितरण और कुल बारिश पर पड़ा। अब मानसून का मौसम लगभग खत्म होने के साथ विदर्भ के सामने सबसे बड़ा सवाल पानी का है। कम बारिश, घटता भूजल स्तर और अधूरे जलस्रोत आने वाली गर्मियों में लोगों की परेशानी बढ़ा सकते हैं। किसानों के लिए यह मानसून सिर्फ कम बारिश का आंकड़ा नहीं, बल्कि अगली फसल और पानी की चिंता छोड़ गया है।


