वंदना विष्णु पांडे ✍️
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा
दशभुजा गणपति मंदिर में प्रवेश करते ही गर्भगृह में स्थित मूर्ति के ऊपरी भाग पर लिखा यह श्लोक दिखाई दिया और मन की सभी भावनाएं उमड़ पड़ीं। अहाहा! कितना सुंदर यह मंदिर है!
संगमरमर की नक्काशीदार स्तंभों पर यह मंदिर टिका हुआ है। गिनने पर ये स्तंभ लगभग तीन दर्जन के करीब होंगे। ऐसे सुंदर, नक्काशीदार संगमरमर के स्तंभों पर की गई कलाकारी देखने लायक है। स्तंभों के निचले भाग में कमल के फूल उकेरे गए हैं। उन्हें हल्का गुलाबी रंग दिया गया है और पूरा स्तंभ संगमरमर के पीलेपन लिए हुए रंग का है। इस मंदिर में दशभुजा गणपति की मूर्ति हल्के क्रीम रंग के पत्थर से बनी हुई है। इसे अत्यंत कलात्मक ढंग से बनाया गया है और यह बहुत आकर्षक है। गणेशपत्नी ‘रिद्धि’ अत्यंत सुंदर दिखाई देती हैं और वे इस मूर्ति की बाईं जांघ पर विराजमान दिखाई देती हैं।
दशभुजा गणपति भगवान का एक अद्वितीय स्वरूप है। दश अर्थात दस और भुज अर्थात हाथ, ऐसा इसका अर्थ है। ‘दस हाथों वाले भगवान’ का दशभुजा गणपति का शाब्दिक अर्थ होता है। ऐसी मूर्ति दुर्लभ ही मानी जाती है। यह अत्यंत प्राचीन मूर्ति है। इसका विशेष धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है।
श्री गणेश अपने इन दस हाथों के माध्यम से ज्ञान, संरक्षण, शक्ति, विघ्नहरण जैसे विभिन्न कार्यों और आशीर्वादों को अपने भक्तों तक पहुंचाते हैं।
अपने ‘दशभुजा गणपति’ नाम के अनुरूप ही यह मूर्ति भव्य और शानदार दिखाई देती है।
इस दशभुजा गणपति की सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है। ऐसी मूर्ति विशेष रूप से जागृत मानी जाती है। इसकी प्रतिदिन की पूजा विशेष पद्धति और नियमबद्ध तरीके से की जाती है।
पौराणिक कथाओं और परंपरा के अनुसार ऐसी सूंड वाली मूर्ति अत्यंत शुभ मानी जाती है। यह मूर्ति अत्यंत दिव्य है। अपार श्रद्धा और भक्ति के साथ इस मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित किया गया है। इस मूर्ति के मुख की ओर देखने मात्र से अशांत मन शांत हो जाता है। किसी भी व्यक्ति को यहां मन की शांति और संतोष प्राप्त होता है। इस मंदिर में स्वागत के लिए बनाई गई मेहराबें, शिखर, गर्भगृह—सब कुछ भव्य और दिव्य है।
गणेश चतुर्थी और अन्य त्योहारों के अवसर पर इस मंदिर में काफी भीड़ होती है।
अग्रपूजा का मान श्री गणेश का है! उन्हें मनःपूर्वक नमन!
पुणे का कर्वे रोड यानी बेहद व्यस्त इलाका! इसी के बीचों-बीच स्थित है यह “श्री दशभुजा गणपति मंदिर”।
इस मंदिर की उत्पत्ति पेशवाकालीन होने की जानकारी मिलती है। पुणे शहर का ऐतिहासिक महत्व सभी जानते हैं।
ब्रिटिश शासन से पहले मराठा साम्राज्य फैला हुआ था। मराठा साम्राज्य के शासक के रूप में ‘श्रीमंत पेशवे’ पूरा राज्यकारभार चलाते थे। पेशवाओं के दरबार के एक प्रतिष्ठित सरदार, ‘हरिपंत फडके’, धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे। उनकी मालिकी की एक जमीन का टुकड़ा था। वहां कुआं खोदने का काम चल रहा था, तभी उस स्थान पर उन्हें श्री गणपति की दस हाथों वाली एक पवित्र और दुर्लभ मूर्ति मिली। उन्होंने तत्काल उसी स्थान पर एक सुंदर मंदिर बनवाने की व्यवस्था की। यही है वह ‘श्री दशभुजा गणपति मंदिर’।
कुछ कागजी अभिलेखों से ऐसा दिखाई देता है कि बाद में यह मंदिर विवाह के समय दहेज के हिस्से के रूप में पेशवा शासकों को दान किया गया था।
इस मंदिर के परिसर में श्री हनुमान जी का एक छोटा मंदिर भी है।
इस मंदिर से पांच मिनट की दूरी पर श्री महामृत्युंजय मंदिर है। इन सभी मंदिरों की व्यवस्था श्री ‘देवदेवेश्वर संस्थान पर्वती एवं कोथरूड, पुणे’ द्वारा देखी जाती है। इन मंदिरों की पूरी देखभाल भी उनके द्वारा की जाती है।
श्री दशभुजा गणपति के प्रत्यक्ष दर्शन करने के बाद मन में प्रचंड भक्तिभाव जागृत हुआ और यह लेखन-प्रपंच हुआ। यह लेखांजलि श्री गणेश के चरणों में अर्पित। 🙏🏻🌹


