विशेष श्रृंखला | दस गणपति, दस कहानियां

l पवनी का पंचानन गणेश l

मंजुषा विश्वेकर ✍️

नागपूर शहर से 105 किलोमीटर की सड़क मार्ग से महाराष्ट्र राज्य में भंडारा जिले के अंतर्गत ऐतिहासिक गाँव पवनी आज भी अपने पावन भूमि होने की साक्ष देता है l जिसे विदर्भ की काशी कहा जाता हैl वैनगंगा नदी का तट और अनेक मंदिरों के कारण यह धार्मिक स्थल भी है l
इन सभी मंदिरों और नदी, घाट, किले की दीवार के मध्य में स्थित है प्राचीन गणेश मंदिर पंचानन गणपति। इसे सर्वतोभद्र गणपति भी कहते है l
पवनी गांव के पुराने रहवासी श्री. भट्ट के यहाँ या उन्हीं के पुरखों से निर्माण किया, यह गणेश मंदिर उन्हीं के घर के सामने हैl यह मूर्ति लगभग 90 सेंटीमीटर ऊंची है l इस मूर्ति को पुरातत्व विभाग के दृष्टि से भी प्राचीन माना गया है। “विदर्भ के अष्टविनायक” में इस गणेश की गिनती होती है l
यह गणपति मूर्ति शमी वृक्ष के काठ(लकड़ी) पर बनाई गई है और 700 वर्ष पुरानी है। 11 वे शतक में इस मंदिर का निर्माण हुआ ऐसा भट्ट के परिवार जन बताते है ।मंदिर में चारों दिशाओं में जो स्तंभ है इसमें एकदूसरे के पीठ को पीठ लगाए यह पांच गणेश जी विराजमान है इसीलिए इन्हें पंचानन गणेश कहते है । स्तंभ के कर्णछेद रेखा पर उसकी पांचवीं सुंदर प्रतिमा है और उसे सभी भक्तजन पूजते है । लाल रंग की यह मूर्ति अपने आप में साक्षात गणेश जी के दर्शन कराती है। मनोवांछित इच्छाएं पूर्ण करने वाले यह गणपति की पूजा पाठ करने की विधि आज भी भट्ट परिवार बड़े श्रद्धा से करते है ।

सर्वतोभद्र गणपति की कहानी और महत्व मुख्य रूप से विदर्भ (महाराष्ट्र) के अष्टविनायक से जुड़ी है ।’सर्वतोभद्र’ का शाब्दिक अर्थ होता है
जो सब ओर से कल्याणकारी और शुभ हो,
इस नाम के पीछे एक प्राचीन पौराणिक कथा और एक विशेष पूजा पद्धति का महत्व भी है ।
पौराणिक कथा –विदर्भ के अष्टविनायक से जुड़ी कहानी कुछ इस प्रकार से है। ऐसा दस्तावेज मिलता है l

प्राचीन काल में महापाप, संकष्ट और शत्रु
नाम के तीन महाशक्तिशाली राक्षसों ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उनके अत्याचारों से मनुष्य, ऋषि-मुनि और देवता सभी अत्यधिक त्रस्त थे।
इन दानवों के आतंक से मुक्ति पाने के लिए सभी देवताओं ने भगवान शिव और माता पार्वती
के प्रतीक स्वरूप माने जाने वाले शमी वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान गणेश की कठोर आराधना की। देवताओं की भक्ति से प्रसन्न होकर शमी वृक्ष की जड़ों से स्वयं भगवान गणेश प्रकट हुए। प्रकट होने के बाद उन्होंने उन तीनों भयानक दानवों का संहार किया और सृष्टि को उनके भय से मुक्त कराया।
जिस स्थान पर यह पौराणिक घटना घटी थी, वहां मुद्गल ऋषि ने भगवान गणेश की इस अद्भुत मूर्ति की स्थापना की। चारों दिशाओं से भाविकों इस मूर्ति के दर्शन होते है ।
वैसे देखा जाए तो यह एक गणेश मूर्ति नहीं है, मंदिर में जो पाषाण है,उसे पांच मुख है ,इसलिए इन्हें सर्वतोभद्र गणपती, भद्रा गणपती, पंचानन, विघ्नराज ऐसे विविध नामों से संबोधित किया जाता है।
कुछ लोग कहते है कि,यह मंदिर
पालांदूर गाव के श्रीहरिस्वामी जोशी इन्होंने बांधा है । गणपति विराजमान की विविध कथाएं है।
पौनी गांव में तटबंदी आज भी प्राचीन शहर होने की साक्ष देता है।इस परिसर में अन्य गांवों के लिए व्यापारी पेठ है ,आसपास के गांव के कई लोग ,व्यापारी दर्शन हेतु और अपनी मनोवांछित ईच्छा पूर्ण करने हेतु पंचानन गणेश के दर्शन किये बिना जाते नहीं है।
मंदिर के सामने एक गरुड़स्तंभ है। यहां जो निर्माण कार्य हुआ है वह कोंकण के मंदिरों जैसा है इसलिए यह मंदिर पालांदूर गांव के श्रीहरिस्वामी जोशी इन्होंने बांधा होगा ऐसा कहा जाता है। इस मंदिर का स्वामित्व पिछले
१३ पीढ़ियों से भट परिवार के तरफ ही है ।
ऐसे पावन और अद्भुत गणेश जी के दर्शन मात्र से ही सुकून और शांति मिलती है। सभी कष्ट और पीड़ाएं दूर होती है।
तो चलिए , गणेश जी के सुंदर मूर्ति का हम मन में ही दर्शन करते है।
“लोकतंत्र मिरर” ने आज हम सब वाचकों को यह अवसर दिया है कि , गणेश जी के विविध रूप के घर बैठे हमें दर्शन हो ल।
“वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्य समप्रभ निर्विघ्नम कुरुम्हे देव सर्वकार्येषु सर्वदा”

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