हर्षा हरीश वाघमारे ✍️
मोरगांव के श्री मोरेश्वर को ही मयूरेश्वर गणपति कहा जाता है। यह गणपति महाराष्ट्र के अष्टविनायकों में प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण गणपति माने जाते हैं। अष्टविनायक मंदिरों में यह मंदिर विशेष महत्व रखता है। मंदिर में चार प्रवेशद्वार हैं और प्रत्येक प्रवेशद्वार पर अलग-अलग युगों में गणपति के अवतारों के चित्र अंकित हैं। यह मंदिर उत्तराभिमुख है और इसकी तटबंदी लगभग 50 फीट ऊंची है। मंदिर परिसर में दो दीपमालाएं हैं।
मंदिर में प्रवेश करते ही छह फीट ऊंचे पत्थर के मूषक और विशाल बैठे हुए नंदी के दर्शन होते हैं। नंदी का मुख गणपति की ओर है। गणपति के सामने नंदी विराजमान होने वाला यह एकमात्र मंदिर माना जाता है। मूषक और नंदी मंदिर के पास पहरेदार के रूप में माने जाते हैं। यहां के स्वयंभू गणपति की सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है। गणपति की नाभि और आंखों में हीरे जड़े हुए हैं। मूर्ति के ऊपर नागराज का सुरक्षात्मक फणा है। मंदिर में रिद्धि-सिद्धि की पीतल की मूर्तियां भी हैं।
यह मंदिर पुणे जिले की बारामती तहसील में करहा नदी के किनारे स्थित है। मयूरेश्वर मंदिर अत्यंत प्राचीन माना जाता है और काले पत्थरों से निर्मित है। इसके चारों कोनों पर मीनारें हैं। मंदिर का स्वरूप किसी पुराने किले जैसा दिखाई देता है। मूर्ति के मस्तक पर नागराज का फणा है। मूर्ति के सामने मूषक और मोर खड़े हैं। इसके अलावा गणपति के सामने नंदी भी विराजमान हैं, जबकि नंदी सामान्यतः भगवान शिव के मंदिर में दिखाई देते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार मयूरेश्वर गणपति के सामने शिव की आराधना करने के लिए नंदी विराजमान हैं। यही इस मंदिर की विशेषता और रहस्य माना जाता है।
मयूरेश्वर गणपति का धार्मिक महत्व भी विशेष है। मान्यता है कि अष्टविनायक यात्रा की शुरुआत इसी गणपति के दर्शन से होती है और सभी गणपतियों के दर्शन करने के बाद यात्रा यहीं आकर पूरी होती है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान गणेश ने मयूर पर सवार होकर सिंधुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस युद्ध के दौरान मयूर को वाहन के रूप में स्वीकार करने के कारण गणपति को मयूरेश्वर और मोरेश्वर नाम मिला।
मयूर ग्राम यानी मोरगांव क्षेत्र में पहले मोरों की संख्या बहुत अधिक थी। इसी कारण इस गांव का नाम मोरगांव पड़ा। यह मंदिर मोरगांव के सूबेदार गोळे ने बनवाया था। इसका निर्माण आदिलशाही कालखंड में हुआ माना जाता है। पैदल सेना के प्रमुख सरनौबत नरवीर पिलाजी गोळे के दादा सूबेदार गोळे थे।
मयूरेश्वर गणपति के दर्शन के लिए पुणे से हडपसर और जेजुरी मार्ग से जाया जा सकता है। पुणे से मोरगांव की दूरी लगभग 60 से 65 किलोमीटर है। ऐसा यह मोरगांव का मोरेश्वर गणपति अपनी धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है।


