विशेष श्रृंखला | दस गणपति, दस कहानियां

बहती है कोमल दूर्वांकुर की धारा

वीणा वि. मुळे ✍️

कार्य के आरंभ में गणपति स्तवन करना भारतीय संस्कृति की मन को दी गई एक सीख है। हाथ में लिए गए कार्य में सफलता प्राप्त हो, इसलिए भक्तिभाव से हाथ जोड़कर गणेशजी से की गई प्रार्थना है। इसीलिए सबसे पहले गणपति का जयघोष किया जाता है।

श्री गजानन जय गजानन
जय गजानन मोरया
मोरया मोरया मंगलमूर्ति मोरया
मोरया मोरया बल्लालेश्वर मोरया
मोरया मोरया सिद्धिविनायक मोरया
मोरया मोरया वरदविनायक मोरया
मोरया मोरया चिंतामणि मोरया
मोरया मोरया गिरिजात्मज मोरया
मोरया मोरया विघ्नेश्वर मोरया
मोरया मोरया मयूरेश्वर मोरया
मोरया मोरया महागणपति मोरया।

इन अष्टविनायकों को नमन कर कार्य में सफलता प्राप्त हो, ऐसा आशीर्वाद मोरया से लेते हैं।

अष्टविनायक अर्थात स्वयंभू गणपति के आठ मंदिर। गजानन महाराष्ट्र के प्रिय आराध्य देवता हैं, इसलिए गणपति के मंदिर और उनके पवित्र गर्भगृह आज अनेक स्थानों पर देखने को मिलते हैं। नाम भिन्न हो सकते हैं, लेकिन भक्तिभाव हर जगह एक जैसा होता है। मंदिरों की बनावट भी हर जगह अलग-अलग देखने को मिलती है।

विघ्नहर्ता श्री गणेश के प्रति हम अपनी भक्ति अर्पित करते हैं। उस भक्तिमय वातावरण में मन को वास्तव में शांति मिलती है और गणेशजी के सामने नतमस्तक होकर कहा जाता है—गणपति बाप्पा मोरया।

ऐसे अष्टविनायकों में महागणपति के रूप में जिनका उल्लेख किया जाता है, वे रांजणगांव के महागणपति हैं। भक्तों की अत्यंत बड़ी आस्था का केंद्र है रांजणगांव का यह महागणपति मंदिर।

रांजणगांव में महागणपति मंदिर का स्वरूप पहले बहुत ही साधारण था। लगभग बारह सौ वर्ष पहले का यह स्थान माना जाता है। पुणे जिले की शिरूर तहसील में नगर मार्ग पर लगभग एक घंटे की दूरी पर यह स्वयंभू स्थान स्थित है। चतुर्थी के समय और भाद्रपद महीने में इस देवस्थान में भक्ति का सैलाब उमड़ पड़ता है। इस भक्ति की धारा में छोटे-बड़े, गरीब-अमीर सभी श्रद्धालु सराबोर हो जाते हैं।

इस पवित्र महागणपति स्थान की एक पौराणिक कथा भी है। प्रत्येक पवित्र गर्भगृह का अपना इतिहास होता है और हर स्थान की अपनी कथा होती है। लेकिन भाव एक ही है—भक्ति का। यही भाव सभी के हृदय में निवास करता है।

त्रिपुरासुर नामक राक्षस ने आराधना कर भगवान को प्रसन्न किया और वरदान मांगा कि भगवान शंकर के अलावा उसे कोई भी नष्ट न कर सके। भगवान ने “तथास्तु” कहा। वरदान मिलने के बाद त्रिपुरासुर इतना उन्मत्त हो गया कि सभी शक्तिशाली देवता भी उससे भयभीत होने लगे। त्रिपुरासुर इंद्रदेव के आसन पर जाकर बैठ गया।

त्रिपुरासुर के इस उन्मत्तपन को समाप्त करने के संदर्भ में भगवान शंकर ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और कहा कि मुझे 64 कलाओं का ज्ञान है। मैं तुम्हें वे कलाएं दिखाने आया हूं। त्रिपुरासुर ने ब्राह्मण की बात मान ली। तब उस ब्राह्मण ने उसे तीन विमान दिए और कहा, “तुम इन विमानों से कहीं भी जा सकते हो, लेकिन शंकर के हाथ से चलाए गए बाण से तुम नष्ट हो जाओगे।”

इसके बाद त्रिपुरासुर राक्षस और भगवान शंकर के बीच घनघोर युद्ध हुआ। यह युद्ध कई दिनों तक चलता रहा। अब इसका कोई उपाय खोजना चाहिए, ऐसा सोचकर त्रैलोक्यगामी नारद ने एक उपाय किया। उन्होंने भगवान शंकर को याद दिलाया कि, “भगवन्, आपने गणेशजी से कहा था कि सबसे पहले आपकी पूजा की जाएगी, तभी कार्य सिद्ध होगा।”

नारद की बात सुनकर भगवान शंकर को यह बात याद आई। उन्होंने “प्रणम्य शिरसा देवम्” मंत्र का जाप किया और एक ही बाण से त्रिपुरासुर का वध कर दिया। कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को हुई इस घटना को ‘त्रिपुरारी पूर्णिमा’ के रूप में माना जाता है।

“प्रणम्य शिरसा देवम्” यह महामंत्र भगवान शंकर ने गणपति की साधना में कहा था। जिस स्थान पर उन्होंने गणपति की साधना की, वह मणिपुर नामक गांव था। मणिपुर को आज रांजणगांव के नाम से जाना जाता है और गर्भगृह में विराजमान भगवान गणेश श्रद्धा का केंद्र हैं—महागणपति।

रांजणगांव के महागणपति की मूर्ति अत्यंत सुंदर और रेखीव है। बाईं ओर मुड़ी हुई सूंड वाली यह मूर्ति है। मूर्ति का मस्तक चौड़ा है और दोनों ओर ऋद्धि-सिद्धि विराजमान हैं।

इस मूर्ति का स्थान-महात्म्य एक अन्य विशेषता के कारण भी और अधिक बढ़ जाता है। मंदिर के गर्भगृह की रचना इस प्रकार की गई है कि सूर्य की किरणें सीधे महागणपति की मूर्ति पर पड़ती हैं। विशेष दिनों में सूर्य की ये किरणें शेंदूर से सजी मूर्ति की शोभा और बढ़ा देती हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन के मध्य सूर्य की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सूर्य की किरणों की यह व्यवस्था की गई है। सूर्यदेव किरणों का नंदादीप लेकर सबसे पहले महागणपति की पूजा करते हैं।

यहां स्थापत्य कला और कौशल का एक बेहतरीन नमूना देखने को मिलता है। संक्षेप में कहें तो वास्तुकला, शिल्पकला और स्वयंभू मूर्ति के तेज का संगम यहां दिखाई देता है। मूर्ति के दर्शन करते समय भक्तिभाव और भी गहरा हो जाता है।

पूर्वाभिमुख इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप भक्तों की सुविधाओं से युक्त है। मंदिर का गर्भगृह माधवराव पेशवा ने बनवाया था। मराठा राज्य के चौथे पेशवा माधवराव का गणेशजी से भावनात्मक संबंध था। आज रांजणगांव में भक्तों के लिए कई भक्त निवास हैं। रहने और प्रसाद की उत्तम व्यवस्था भी उपलब्ध है। भाद्रपद महीने में चतुर्थी से चतुर्दशी तक यहां भक्तिरस भरपूर देखने को मिलता है।

प्रत्येक गणपति के स्थान-महात्म्य की अपनी अलग कथा होती है। गणपति का नाम और सूंड की बनावट भी एक-दूसरे से अलग होती है। चौदह विद्याओं और चौसठ कलाओं के अधिपति गणेशजी के अनेक जागृत स्थान हैं। रांजणगांव का महागणपति अष्टविनायकों में से एक माना जाता है। महागणपति की अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि अष्टविनायक दर्शन के बाद जिस गणपति के दर्शन सबसे पहले किए गए हों, उसी गणपति का दोबारा दर्शन और पूजन करना चाहिए। साथ ही शुरुआत में लिया गया नारियल अंतिम गणपति के दर्शन तक प्रसाद के रूप में संभालकर रखना चाहिए। यह पारंपरिक रीति आज भी कुछ भक्तों द्वारा निभाई जाती दिखाई देती है।

रांजणगांव के इस महागणपति को ‘महोत्कट’ भी कहा जाता है।

देवों के देव महागणपति सबसे अलग,
बहती है कोमल दूर्वांकुर की धारा।

लोकतंत्र मिरर

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