प्रा. डॉ. सुनील देशपांडे (सेवानिवृत्त) ✍️
क्या आपने कभी किसी मंदिर में पुजारी या गुरुजी को सीढ़ी पर चढ़कर भगवान की मूर्ति की पूजा करते, भगवान का श्रृंगार करते और पुष्पमाला अर्पित करते हुए देखा है? नहीं न…
तो फिर इस आश्चर्यजनक पद्धति की पूजा देखनी हो तो श्रीक्षेत्र आदासा स्थित मंदिर में आकर महागणपति की पूजा अवश्य देखें। इस महागणपति को “शमीविघ्नेश” गणेश के नाम से भी संबोधित किया जाता है।
आदासा देवस्थान
नागपुर से मात्र 38 किलोमीटर की दूरी पर नागपुर जिले के कलमेश्वर तालुका में धापेवाड़ा गांव से (विदर्भ का प्रति पंढरपुर विठ्ठल मंदिर) केवल 7 किलोमीटर दूर, प्राकृतिक वातावरण में एक पहाड़ी पर आदासा मंदिर स्थित है। यहां श्री शामिविग्नेश महागणपति विराजमान हैं। गणेशजी का विशाल स्वरूप अपनी भव्यता की साक्षी देते हुए यहां जागृत अवस्था में विराजमान है। 11 फीट ऊंची और 7 फीट चौड़ी भव्य स्वयंभू गणेश प्रतिमा यहां स्थापित है। मूर्ति के दर्शन करते ही उसके भव्य स्वरूप की छाप मन पर पड़ती है।
अदोष क्षेत्र आदासा
ऐसी मान्यता है कि पूर्वकाल में भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण करने के लिए इस दोषरहित क्षेत्र में भगवान महागणपति की उपासना की थी। इसी कारण इस स्थान को अदोष क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। ऐसे पवित्र स्थान पर यह जागृत देवस्थान स्थित है। यहां का गणपति मंदिर अत्यंत प्राचीन है और इसे विदर्भ के अष्टविनायकों में से एक के रूप में जाना जाता है।
मंदिर में स्थापित गणपति की यह प्रतिमा एक ही पत्थर में उकेरी गई है। ऐसा कहा जाता है कि आज मंदिर में विराजमान प्रतिमा गणेशपुराण में वर्णित बारह गणपतियों में से एक है। गणपति की मूर्ति स्वयंभू मानी जाती है।
आदासा गणपति का पौराणिक इतिहास
आदासा का प्राचीन नाम ‘अदोष’ या ‘अदोषपुर’ होने का उल्लेख कुछ पुराण आधारित अध्ययनों में मिलता है। इस स्थान को गणेशपुराण की कथा से जोड़ा जाता है। एक विद्वत्तापूर्ण अध्ययन में आधुनिक आदासा को ही पुराणों में वर्णित ‘अदोषपुर’ माना गया है।
वामन अवतार की कथा भी इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है। पुराण परंपरा के अनुसार राजा बलि ने इंद्रपद प्राप्त करने के लिए बड़े पैमाने पर यज्ञ शुरू किए थे। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगने से पहले अदोष क्षेत्र में श्रीगणेश की आराधना की थी, ऐसी कथा है। गणेशजी की कृपा प्राप्त करने के बाद वामन ने राजा बलि के राज्य को तीन पगों में नापकर पूरे त्रिलोक को अपने अधीन कर लिया।
आदासा गणपति को ‘शमीविघ्नेश्वर’ क्यों कहा जाता है?
आदासा गणपति का एक दूसरा नाम है और उन्हें श्री शमीविघ्नेश्वर के नाम से भी संबोधित किया जाता है।
ऐसी आख्यायिका है कि देवताओं के संकट के समय यह महागणपति उनकी सहायता के लिए दौड़कर आए और दैत्यों को युद्ध में पराजित कर देवताओं की विजय को आसान बनाया। हालांकि युद्ध के बाद इस गणपति के शरीर में दाह उत्पन्न हुआ, जो शमी के पत्ते अर्पित करने के बाद ही कम हुआ, ऐसी मान्यता है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार शमी वृक्ष के साथ इस गणेश क्षेत्र का विशेष संबंध है। इसलिए यहां गणपति की पूजा में दूर्वा जितना ही महत्व शमी पत्र का भी है।
यहां की गणेश प्रतिमा स्वयंभू होने की श्रद्धा है और एक विशाल पाषाण से निर्मित होने की बात कही जाती है। महाराष्ट्र शासन के नागपुर जिला संकेतस्थल पर भी इसका उल्लेख किया गया है।
मंदिर का ऐतिहासिक वैशिष्ट्य
यह केवल पौराणिक श्रद्धास्थल ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वास्तु के रूप में भी महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र के गजेटियर में आदासा को विदर्भ के ऐतिहासिक गणेश क्षेत्र के रूप में उल्लेखित किया गया है। मंदिर की वास्तुशैली हेमाडपंथी पद्धति की है और मंदिर का कालखंड लगभग 13वीं शताब्दी का होने का उल्लेख मिलता है।
मंदिर परिसर में लगभग 10 हेक्टेयर क्षेत्र में कई छोटे मंदिर स्थित हैं। महादेव मंदिर में तीन स्वयंभू शिवलिंग होने की भी स्थानीय श्रद्धा है।
आदासा मंदिर 4,000 वर्ष पुराना है, ऐसी स्थानीय और धार्मिक परंपरा में मान्यता मिलती है। हालांकि इस कालखंड को निश्चित करने वाला पुरातात्त्विक प्रमाण एक अलग विषय है। इसलिए “4,000 वर्ष पुराना” होने की बात को श्रद्धा और स्थानीय परंपरा में प्रचलित मान्यता के रूप में देखना अधिक उचित है। महाराष्ट्र शासन की विरासत संबंधी जानकारी में भी इस मंदिर को 4,000 वर्ष पुराना माना जाता है, ऐसा उल्लेख मिलता है।
मंदिर के बिल्कुल पास तक अब वाहन पहुंचते हैं, इसलिए पहाड़ी चढ़ने में अधिक कठिनाई नहीं होती। हालांकि दूसरी ओर बड़े-बड़े पत्थरों से बनी प्राचीन सीढ़ियां आज भी इसके पुराने कालखंड की गवाही देते हुए खड़ी हैं।
अब मंदिर परिसर को काफी विकसित किया गया है। परिसर में आकर्षक फव्वारे भी लगाए गए हैं। पूजा सामग्री की दुकानें, फराल-भोजन तथा खिलौनों की दुकानें भी अब यहां उपलब्ध हैं।
उत्सव और यात्रा
गणेश चतुर्थी और माघी गणेशोत्सव के दौरान यहां बड़ा उत्सव आयोजित होता है। माघ शुद्ध चतुर्थी को यहां भव्य यात्रा भरती है, जिसमें विदर्भ सहित राज्यभर से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
इसी प्रकार प्रत्येक महीने आने वाली संकष्टी चतुर्थी के अवसर पर भी यहां श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ होती है।
विदर्भ में आदासा गणपति को विशेष रूप से “विघ्नहर्ता” के रूप में भक्त मानते हैं। जीवन की बाधाएं दूर हों, मनोकामनाएं पूर्ण हों और कार्यों में सफलता मिले, इस उद्देश्य से यहां दर्शन और पूजा की जाती है।
यहां की एक लोकप्रिय परंपरा मंदिर में स्थित विशाल मूषक के कान में अपनी मनोकामना कहने की है। गणपति के वाहन मूषक के माध्यम से अपनी इच्छा और भक्ति गणपति तक पहुंचती है, ऐसी भक्तों की श्रद्धा है।
कुल मिलाकर आदासा तीर्थक्षेत्र प्राचीन काल से ही अपनी विशेष गणेश प्रतिमा और रमणीय प्राकृतिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। इसलिए सभी श्रद्धालुओं, विशेषकर गणेश भक्तों को यहां आकर दर्शन अवश्य करना चाहिए।
श्री शामीविघ्नेश गणपति का मूल मंत्र
“ॐ साक्ष्यात् ब्रह्म गजानन दशभुज तू वक्रतुंड विभु।
विष्णु वादीश्वर पूजित कृतयुग भक्तांदी दैदातक।
पश्चात् वामन सेवित श्रीमद् भलशास्त्रमे।
क्षेत्र अदोष हरे स्थित कृदीभजे भव्य श्री शमीविघ्नपम्।
जय शमी विघ्नेश प्रसन्न।”


