विशेष श्रृंखला | दस गणपति, दस कहानियां

//श्री// नागपुर का गौरव ‘‘भुरे गणपति मंदिर”

श्री मनोज वैद्य ✍️

नागपुर का अपना एक समृद्ध सांस्कृतिक वैभव है। लगभग सत्तर वर्षों से निकलने वाली रामनवमी शोभायात्रा हो या पोला के करी दिवस पर निकलने वाली बड़ग्या मारबत की शोभायात्रा, ऐसे अनेक त्योहार आज भी हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को संजोए हुए हैं। नागपुर भोसलों की नगरी है। भोसलों ने जगह-जगह देवस्थानों की स्थापना की और उनकी व्यवस्था के लिए वेतनभोगी पुजारी भी नियुक्त किए थे। आज भी ऐसे अनेक प्राचीन देवस्थान महल जैसे क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं। आग्याराम देवी, पोद्दारेश्वर राम मंदिर, राजाबक्षा का मारोती, रमणा मारोती, टेकड़ी गणपति, तेलंखेड़ी मारुति जैसे अनेक प्रसिद्ध देवस्थान यहां देखने को मिलते हैं।

महाल परिसर यानी पुराना नागपुर। नागपुर महानगर पालिका की भव्य इमारत, डॉ. हेडगेवार का निवासस्थान, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय और इतवारी जैसे पुराने बाजार इस महाल क्षेत्र की प्रसिद्ध पहचान हैं। घनी आबादी वाला यह क्षेत्र आज भी अपने सांस्कृतिक वैभव को संजोए हुए है। खास बात यह है कि इस क्षेत्र में सभी जाति-धर्म के लोग रहते हैं, इसलिए यहां हर धर्म के उत्सव बड़े पैमाने पर देखने को मिलते हैं।

दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यह जन्मभूमि है। डॉ. हेडगेवार ने जिस स्थान पर पहली शाखा शुरू की थी, उस मोहिते वाड़ा के ठीक सामने प्रसिद्ध भुरे गणपति मंदिर स्थित है। यह गणपति अत्यंत जागृत और मनोकामना पूर्ण करने वाले गणपति के रूप में प्रसिद्ध हैं। विवाह के इच्छुक युवक-युवतियां भी बड़ी संख्या में इस मंदिर में आते हैं।

‘भुरे का गणपति’ ऐसा क्यों कहा जाता है, इसे लेकर मेरे मन में भी जिज्ञासा थी। लगभग 300 वर्षों से अधिक पुराना यह मंदिर अपनी विशिष्ट परंपरा के लिए जाना जाता है। सद्गुरु विष्णु (बंगाजी) काशीप भुरे इसके मूल पुरुष माने जाते हैं। वे मूल रूप से आदासा गांव के निवासी थे। बचपन से ही उन्हें श्रीगणेश की साधना का ध्यास था। उन्होंने मात्र 12 वर्ष की आयु में ही साधना और तपश्चर्या की। इसके बाद आध्यात्मिक लोकजागृति के लिए गुरु के आदेश पर वे नागपुर आए। शमी की पूजा करना उनका नित्यक्रम था। प्रतिदिन पूजा करने के बाद दोपहर के समय वे वायु वेग से आदासा जाकर गणपति के दर्शन करते थे। इसके बाद स्वयं गणपति ने उन्हें दृष्टांत दिया और शमी के वृक्ष के तने के पास प्रत्यक्ष मूर्ति प्रकट हुई। आज भी वह प्राचीन शमी वृक्ष यहां मौजूद है।

श्री भुरे महाराज की नातिन का विवाह कावले परिवार में हुआ था। आगे चलकर शिष्य के रूप में भुरे बुवा के नाती श्री धुंडीराजपंत कावले को स्वयं श्री भुरे महाराज ने इस देवघर की परंपरा, भैरवदंड, शमी की माला तथा यहां के कुलाचार और उत्सव मनाने के अधिकार प्रदान किए। आज तक कावले परिवार श्रद्धापूर्वक श्रीगणेश की पूजा-अर्चना, परंपरा और उत्सव बड़े आनंद से निभाता आ रहा है। पूरे नागपुर के गणेश भक्त गणेश चतुर्थी के अवसर पर बड़ी श्रद्धा से यहां आते हैं। सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले सुखकर्ता भुरे गणपति जागृत देवस्थान हैं और नागपुर का गौरव हैं।

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