बंद कमरे में जातिसूचक गाली पर SC/ST एक्ट नहीं, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

‘सार्वजनिक दृष्टि’ में होना जरूरी ; स्कूल के बंद कमरे में हुई घटना पर अहम टिप्पणी

नई दिल्ली : अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल जातिसूचक गाली या अपमान का आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत मामला बनने के लिए कथित घटना का ‘सार्वजनिक दृष्टि में’  होना जरूरी है। यानी घटना ऐसी जगह हुई हो, जहां आम लोग उसे देख या सुन सकें। यह फैसला 20 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने ‘रामकृष्ण चौहान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य’ मामले में सुनाया।

स्कूल के बंद कमरे में हुआ था विवाद

मामला उत्तर प्रदेश के एक स्कूल से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के दो बच्चे स्कूल में पढ़ते थे। विद्यार्थियों के बीच हुए विवाद के बाद शिकायतकर्ता स्कूल के प्रबंधक रामकृष्ण चौहान से मिलने पहुंचा था। आरोप लगाया गया कि बातचीत के दौरान उसके साथ मारपीट की गई और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद 25 जनवरी 2020 को चौहान और अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत FIR दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र भी दाखिल किया गया था।

कमरे में आम लोगों की मौजूदगी नहीं थी

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर गौर करते हुए पाया कि कथित घटना स्कूल के एक बंद कमरे में हुई थी। जांच अधिकारी के घटनास्थल के नक्शे में भी कमरे के बंद होने और वहां आम लोगों की पहुंच नहीं होने की बात सामने आई। जांच के दौरान जिन शिक्षकों के बयान दर्ज किए गए, उन्होंने दोनों पक्षों के बीच विवाद और हाथापाई की बात कही। हालांकि, किसी भी गवाह ने यह नहीं कहा कि उसने कथित जातिसूचक टिप्पणी को सुना या उस समय कमरे में मौजूद था। अदालत ने साफ किया कि सिर्फ स्कूल परिसर में कुछ लोगों की मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि कथित जातिसूचक टिप्पणी ‘सार्वजनिक दृष्टि’ में की गई थी।

FIR में भी जातिसूचक शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने FIR और मामले से जुड़े दस्तावेजों पर भी गौर किया। अदालत के मुताबिक, FIR में कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए किसी विशिष्ट जातिसूचक शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। उपलब्ध सामग्री से मुख्य रूप से दोनों पक्षों के बीच विवाद और मारपीट की बात सामने आती थी। अदालत ने माना कि SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं के लिए जरूरी मूल तत्व प्रथमदृष्टया दिखाई नहीं देते हैं।

SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई रद्द

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने रामकृष्ण चौहान के खिलाफ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया। साथ ही, भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज अन्य मामलों की कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया।

आखिर ‘सार्वजनिक दृष्टि’ का मतलब क्या ?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि SC/ST एक्ट की इन धाराओं के तहत कथित जातिसूचक अपमान ऐसी जगह होना चाहिए, जहां अन्य लोग उसे देख या सुन सकें। सड़क, बाजार, बस स्टैंड या सार्वजनिक कार्यक्रम जैसी जगहों पर हुई घटना इस कसौटी पर आ सकती है। वहीं, पूरी तरह बंद कमरे में हुई ऐसी घटना, जिसे किसी अन्य व्यक्ति ने देखा या सुना ही नहीं, उसे केवल इसी आधार पर ‘सार्वजनिक दृष्टि’ में हुई घटना नहीं माना जा सकता। यह फैसला जातिसूचक अपमान के मामलों में शिकायत और कानूनी कार्रवाई के लिए ‘सार्वजनिक दृष्टि’ की शर्त को एक बार फिर स्पष्ट करता है।

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