नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को साफ संदेश दिया है कि युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों से निपटने में आक्रामक रवैया अपनाने के बजाय उन्हें समझाने और उनकी बात सुनने की कोशिश की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि अगर कुछ भटके हुए युवा पत्थरबाजी जैसी घटनाओं में शामिल भी हों, तब भी पहला प्रयास उन्हें शांत करने और सही रास्ता दिखाने का होना चाहिए।
यह टिप्पणी संसद की ओर 20 मार्च को निकाले गए मार्च के आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने की।याचिका वायुसेना से सेवानिवृत्त अधिकारी मनीष कुमार सोलंकी ने दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को युवाओं के आंदोलनों से जुड़ी अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ने का निर्देश दिया है।सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि युवाओं को हिंसा की राह पर जाने से रोकने का सबसे प्रभावी तरीका उन्हें समझाना और उनकी बात ध्यान से सुनना है। यदि सरकार सख्त और आक्रामक रुख अपनाती है, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। अदालत ने पुलिस से भी अपील की कि संयम बनाए रखते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन को प्रोत्साहित करें और जहां तनाव का माहौल हो, वहां धैर्य और समझदारी से स्थिति संभालें।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी लोकतंत्र में संवाद और संवेदनशीलता की अहमियत को एक बार फिर सामने लाती है। अदालत का मानना है कि युवाओं की आवाज़ सुनना ही किसी भी विवाद का सबसे बेहतर और शांतिपूर्ण समाधान हो सकता है।


