पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल में शामिल करने पर सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

अनुच्छेद 220 की पाबंदी लागू होगी या नहीं, महिला प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर सुनवाई

नई दिल्ली : राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्यों के रूप में पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीशों को शामिल किए जाने के मामले में अब संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह इस बात पर विचार करेगा कि पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीशों को बार काउंसिल में सहयोजित (Co-opt) करने पर संविधान के अनुच्छेद 220 में दी गई पाबंदी लागू होगी या नहीं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने इस मुद्दे को उठाया। पारिख छह राज्य बार काउंसिलों की ओर से दलील दे रहे थे। उन्होंने कहा कि पूर्व हाईकोर्ट जज को बार काउंसिल का सदस्य बनाए जाने से संविधान में निर्धारित न्यायिक प्रतिबंधों को लेकर सवाल पैदा हो सकता है।

अनुच्छेद 220 का क्या है प्रावधान ?

संविधान का अनुच्छेद 220 किसी पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश के उसी हाईकोर्ट में वकालत करने पर रोक से जुड़ा है। इसी प्रावधान का हवाला देते हुए पारिख ने सवाल उठाया कि यदि किसी ऐसे पूर्व न्यायाधीश को बार काउंसिल का सदस्य बनाया जाता है, तो क्या यह संवैधानिक रोक के दायरे में आएगा। उन्होंने अदालत के समक्ष यह भी सवाल रखा कि क्या संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश पारित किया जा सकता है, जो अधिवक्ता अधिनियम  में मौजूद प्रावधानों के विपरीत हो।

बार-बार अर्जियों के कारण लेना पड़ा फैसला

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत के सामने अलग-अलग पक्षों की ओर से सहयोजन की प्रक्रिया को लेकर लगातार आवेदन और नई मांगें आ रही थीं। हर दिन नए मानदंड सामने रखे जा रहे थे, जिससे स्थिति को संभालना मुश्किल हो रहा था। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व में दिया गया आदेश बार काउंसिल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से था, जिसे सभी पक्षों ने व्यापक रूप से स्वीकार किया था।

अब संवैधानिक पहलू पर होगी नजर

पारिख ने अदालत के सामने यह भी कहा कि आदेश पारित करते समय धूलिया समिति की रिपोर्टों सहित कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार नहीं किया गया। उनका कहना था कि इस पूरे मामले में केवल महिला प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों और अधिवक्ता अधिनियम के बीच तालमेल का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अब सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीशों को राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने की व्यवस्था अनुच्छेद 220 की संवैधानिक पाबंदी से प्रभावित होगी या नहीं। इस सवाल पर अदालत का रुख आगे की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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