नागपुर : कानून की रक्षा करने वाली पुलिस ही अगर अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने लगे, तो आम नागरिक न्याय के लिए कहां जाए? इसी सवाल को गंभीरता से लेते हुए मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक अहम फैसला सुनाया है। बजाजनगर और राणा प्रतापनगर पुलिस द्वारा एक व्यवसायी के खिलाफ दर्ज किए गए दो एफआईआर और उनसे जुड़े मुकदमों को अदालत ने अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति महेंद्र चांदवाणी ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस ने व्यक्तिगत द्वेष और बदले की भावना से कार्रवाई की थी। अदालत के इस फैसले को पुलिस की मनमानी पर एक बड़ी चोट माना जा रहा है।
आठ दिनों में तीन FIR, आरोप भी लगभग एक जैसे
स्वावलंबीनगर निवासी व्यवसायी तपन जयस्वाल ने पुलिस की मनमानी के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता सुबोध धर्माधिकारी और अधिवक्ता सोनवने के माध्यम से याचिकाएं दाखिल की थीं। मामले में सामने आया कि पुलिस ने महज आठ दिनों के भीतर जयस्वाल के खिलाफ तीन एफआईआर दर्ज किए थे। इन शिकायतों में जबरन वसूली, धमकी, अवैध साहूकारी सहित कई समान आरोप लगाए गए थे। हालांकि, इन मामलों की जांच और सुनवाई के दौरान ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
जिसके अपहरण का आरोप, वह जेल में बंद था!
इस मामले में पहले दर्ज एक एफआईआर को हाईकोर्ट ने वर्ष 2022 में ही रद्द कर दिया था। इस शिकायत में जयस्वाल पर अपहरण, हथियार का इस्तेमाल और जबरन वसूली जैसे आरोप लगाए गए थे। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जिस व्यक्ति के अपहरण का आरोप लगाया गया था, वह घटना के समय जेल में बंद था। इस तथ्य के सामने आने के बाद पुलिस को संबंधित मामला वापस लेने की स्थिति का सामना करना पड़ा। वहीं, राणा प्रतापनगर के दूसरे मामले में शिकायतकर्ता विमल कालमेघ ने अदालत में हलफनामा दाखिल कर बताया कि उन्होंने पुलिस के दबाव में जयस्वाल के खिलाफ शिकायत की थी। जाजनगर के तीसरे मामले में शिकायतकर्ता समीर इंगले हाईकोर्ट में पेश ही नहीं हुआ।
अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर उठाए सवाल
मामले से जुड़े इन तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने एफआईआर और संबंधित मुकदमों को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई अपराध अदखलपात्र यानी गैर-संज्ञेय श्रेणी का है, तो पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जांच करना भी कानून के विरुद्ध है। इस मामले में महाराष्ट्र साहूकारी कानून के तहत अदखलपात्र अपराधों को एफआईआर में शामिल किए जाने की बात भी सामने आई।
न्याय के लिए अदालत पहुंचे व्यवसायी को राहत
इस फैसले से तपन जयस्वाल को बड़ी कानूनी राहत मिली है। साथ ही, अदालत ने यह संदेश भी दिया है कि पुलिस को मिले अधिकारों का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए। किसी भी नागरिक के खिलाफ व्यक्तिगत द्वेष या दबाव में की गई कार्रवाई न्यायिक जांच के दायरे में आती है। हाईकोर्ट का यह फैसला पुलिस की जवाबदेही और नागरिकों के कानूनी अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


