जनता का वोट सत्ता की खुली छूट नहीं; जनप्रतिनिधि पुलिस या कोर्ट की भूमिका नहीं निभा सकते

डॉक्टरों से मारपीट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की नगरसेवक समेत चार आरोपियों की जमानत, 5 अक्टूबर तक सरेंडर का आदेश

नई दिल्ली : लोकतंत्र में जनता का भरोसा किसी जनप्रतिनिधि को जिम्मेदारी देता है, मनमानी करने की छूट नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों से मारपीट के एक मामले में सुनवाई करते हुए साफ कहा कि चुने हुए प्रतिनिधि पुलिस, प्रशासन या अदालत की भूमिका अपने हाथ में नहीं ले सकते। लोगों से मिला जनादेश किसी व्यक्ति के लिए निजी अधिकार या दूसरों को डराने-धमकाने की ताकत का आधार नहीं बन सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका के नगरसेवक रमेश सुखर्या म्हात्रे और तीन अन्य आरोपियों को दी गई जमानत रद्द कर दी। मामला जुलाई 2026 का है। आरोप है कि महानगरपालिका के एक अस्पताल के लेबर वार्ड में ड्यूटी पर मौजूद तीन डॉक्टरों, जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं, के साथ मारपीट और गाली-गलौज की गई थी। विवाद प्रसव पीड़ा से जूझ रही एक गर्भवती महिला को दूसरे स्थान पर ले जाने को लेकर हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्वाचित पद पर बैठे व्यक्ति का काम जनता की समस्याओं के समाधान के लिए संस्थाओं को मजबूत करना है। वह खुद पुलिस, प्रशासन या अदालत बनकर अपनी इच्छा लागू नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि डर या दबाव के जरिए किसी से काम करवाने की कोशिश का असर केवल पीड़ित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे कानून के प्रति लोगों का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है।

पीठ ने खास तौर पर ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। डॉक्टर ऐसे समय में काम करते हैं, जब मरीज और उनके परिवार बेहद संवेदनशील स्थिति में होते हैं और कई फैसले तुरंत लेने पड़ते हैं। कोर्ट ने कहा कि ड्यूटी पर मौजूद मेडिकल प्रोफेशनल्स को डराने या उन पर हमला करने की कोशिश को स्वीकार नहीं किया जा सकता, खासकर जब आरोप किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि पर हों। कोर्ट ने जमानत रद्द करते हुए चारों आरोपियों को 5 अक्टूबर 2026 तक ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है। हालांकि, परिस्थितियों में कोई ठोस बदलाव होने पर आरोपियों को दोबारा जमानत के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी गई है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रमेश म्हात्रे के खिलाफ दर्ज 18 मामलों का भी उल्लेख किया। हालांकि, इनमें से 16 मामलों में उन्हें बरी या कार्यवाही से मुक्त किए जाने की बात भी सामने आई। कोर्ट ने यह आशंका भी देखी कि उनके प्रभाव का असर महत्वपूर्ण गवाहों पर पड़ सकता है। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पुलिस और न्यायिक हिरासत के दौरान म्हात्रे जिला सिविल अस्पताल के जेल वार्ड में भर्ती रहे। वहीं, पीड़ित डॉक्टरों के इस्तीफा देने या डर के कारण ड्यूटी से दूर रहने की रिपोर्ट को भी कोर्ट ने गंभीरता से लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को यह जांचने का निर्देश दिया कि क्या लागू निवारक निरोध कानूनों के तहत कोई कार्रवाई बनती है। साथ ही विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट को मुकदमे की सुनवाई जल्द पूरी करने की कोशिश करने को कहा गया है। अभियोजन को 64 गवाहों की सूची की समीक्षा कर अनावश्यक गवाहों को हटाने का भी निर्देश दिया गया। कोर्ट ने मेडिकल स्टाफ और अन्य महत्वपूर्ण गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महाराष्ट्र साक्षी संरक्षण एवं सुरक्षा अधिनियम, 2017 के तहत पर्याप्त सुरक्षा देने को कहा है।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डॉक्टरों को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। अगर किसी मेडिकल प्रोफेशनल की लापरवाही या ड्यूटी में चूक सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—जनता का जनादेश जिम्मेदारी देता है, कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं।

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