नई दिल्ली : परिवारों में संपत्ति के बंटवारे को लेकर अक्सर विवाद देखने को मिलते हैं। ऐसे ही मामलों के बीच कर्नाटक हाईकोर्ट ने पैतृक संपत्ति के अधिकार को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि पिता या दादा से मिली हर संपत्ति को पैतृक संपत्ति नहीं माना जा सकता। कोर्ट के अनुसार, किसी संपत्ति का अधिकार इस बात से तय होगा कि वह संपत्ति मूल रूप से किस तरह प्राप्त हुई थी। केवल पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने से ही संपत्ति ‘पैतृक संपत्ति’ नहीं बन जाती।
खुद की कमाई हुई संपत्ति पर मालिक का पूरा अधिकार
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति ने अपनी मेहनत से संपत्ति खरीदी है और बाद में वह संपत्ति उसके बच्चों को मिलती है, तो उस पर बच्चों को जन्म से अधिकार नहीं मिल जाता। ऐसी संपत्ति मालिक की व्यक्तिगत संपत्ति मानी जाएगी और वह व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार उसे बेच सकता है, किसी को दे सकता है या वसीयत कर सकता है।
बेटी ने मांगा था संपत्ति में हिस्सा
इस मामले में एक बेटी ने अपने दादा की संपत्ति में हिस्सा मांगा था। उसका तर्क था कि यह पारिवारिक संपत्ति है, इसलिए उसे इसमें जन्मसिद्ध अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि संपत्ति मूल रूप से दादा की खुद अर्जित की हुई थी। बाद में समझौते या हस्तांतरण से मिलने के बावजूद उसका स्वरूप नहीं बदला। इसलिए इसे पैतृक संपत्ति नहीं माना जा सकता।
मृत्यु के बाद वारिसों को मिलेगा कानूनी हक
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों के अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं होते। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो हिंदू उत्तराधिकार कानून के अनुसार उसकी संपत्ति सभी कानूनी वारिसों में बांटी जाती है।
संपत्ति विवादों में आएगी बड़ी स्पष्टता
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से संपत्ति विवादों में काफी स्पष्टता आएगी। अब किसी भी संपत्ति पर अधिकार तय करते समय सिर्फ रिश्ते नहीं, बल्कि संपत्ति के असली स्रोत और उसके कानूनी स्वरूप को देखा जाएगा।


