भारत में बिना वैध वाहन बीमा के सड़कों पर दौड़ रहे वाहनों की बढ़ती संख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत जिन वाहनों का वैध बीमा नहीं होगा, उन्हें पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल या डीजल नहीं दिया जाएगा। फिलहाल इस व्यवस्था को पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने का सुझाव दिया गया है। इसके साथ ही बिना बीमा वाले वाहनों की पहचान के लिए स्वचालित ई-चालान प्रणाली लागू करने पर भी विचार किया जा रहा है। डिजिटल तकनीक और कैमरों की मदद से ऐसे वाहनों की पहचान कर उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाएगी। इस पहल का उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को समय पर बीमा का लाभ दिलाना और वाहन मालिकों को नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करना है।
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सामने आए आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। देश में लगभग 30.4 करोड़ पंजीकृत वाहनों में से करीब 16.5 करोड़ वाहनों का बीमा नहीं है। यानी लगभग 56 प्रतिशत वाहन बिना वैध बीमा के सड़कों पर चल रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सड़क दुर्घटनाओं के करीब 22 प्रतिशत मामलों में ऐसे वाहन शामिल होते हैं, जिनका बीमा नहीं होता। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत थर्ड पार्टी बीमा अनिवार्य है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग इस नियम का पालन नहीं कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को उठाना पड़ता है, क्योंकि उन्हें मुआवजा पाने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
क्या है मौजूदा नियम?
मोटर वाहन अधिनियम के अनुसार, बिना वैध थर्ड पार्टी बीमा के वाहन चलाना कानून का उल्लंघन है। पहली बार पकड़े जाने पर तीन महीने तक की जेल, 2,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है। दूसरी बार नियम तोड़ने पर तीन महीने तक की जेल, 4,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। फिलहाल पेट्रोल-डीजल नहीं देने का नियम लागू नहीं हुआ है। यह केवल सुप्रीम कोर्ट का प्रस्ताव है, जिस पर केंद्र सरकार पायलट प्रोजेक्ट के रूप में विचार करेगी। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में इसे पूरे देश में लागू किया जा सकता है।


