कचरे से गैस बनेगा, लेकिन जमीन कहां से आएगी? पुणे में BPCL प्रोजेक्ट अटका

12 एकड़ जमीन का पेच, उरुळी देवाची में बायोमायनिंग बनी बड़ी अड़चन

पुणे : पुणे शहर में बढ़ते कचरे की समस्या से निपटने के लिए कचरे से गैस बनाने का प्रोजेक्ट एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आया है. भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) इस प्रोजेक्ट को अपने खर्च पर शुरू करने के लिए तैयार है. लेकिन प्रोजेक्ट के सामने अब सबसे बड़ी समस्या पैसे की नहीं, बल्कि जमीन की है.

महापालिका की ओर से BPCL को उरुळी देवाची में करीब 12 एकड़ जमीन नाममात्र एक रुपये के किराये पर देने का प्रस्ताव रखा गया है. हालांकि, इस जमीन पर पहले से जमा पुराने कचरे का बायोमायनिंग करना बाकी है. जब तक यह काम पूरा नहीं होता, तब तक जमीन को प्रोजेक्ट के लिए उपलब्ध कराना मुश्किल है. ऐसे में प्रस्ताव मंजूर होने के बाद भी गैस प्रोजेक्ट शुरू होने में कम से कम एक साल की देरी हो सकती है.

रोज निकलता है 2800 टन कचरा

पुणे शहर में हर दिन करीब 2800 टन कचरा निकलता है. इसमें लगभग 1100 टन गीला और 1700 टन सूखा कचरा शामिल है. महापालिका के पास गीले कचरे पर प्रक्रिया करने की करीब 595 टन प्रतिदिन क्षमता है, लेकिन वास्तव में करीब 395 टन कचरे पर ही प्रक्रिया हो रही है. इस वजह से रोजाना करीब 600 से 700 टन गीला कचरा किसानों को खाद बनाने के लिए देना पड़ता है. शहर के बढ़ते कचरे के मुकाबले मौजूदा प्रक्रिया व्यवस्था कम पड़ रही है. ऐसे में कचरे से गैस बनाने जैसी योजनाएं पुणे के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं.

तीन प्रोजेक्ट से बढ़ेगी प्रक्रिया क्षमता

गीले कचरे की समस्या कम करने के लिए शहर में तीन प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं. भूमीग्रीन कंपनी के 500 टन प्रतिदिन क्षमता वाले प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल चुकी है. इसमें उरुळी देवाची के कचरा डेपो की जमीन पर 300 टन गीले कचरे की प्रक्रिया की जाएगी. महापालिका ने इसके लिए मुफ्त जमीन उपलब्ध कराई है और ठेकेदार को प्रति टन 772 रुपये दिए जाएंगे. इस प्रोजेक्ट का काम नवंबर के अंत तक शुरू होने की उम्मीद है. इसके अलावा 300 टन प्रतिदिन क्षमता वाला सीबीजी गैस प्रोजेक्ट भी प्रस्तावित है. हालांकि, इसकी दर को लेकर प्रशासन और पात्र ठेकेदारों के बीच बातचीत चल रही है और फैसला अभी बाकी है.

BPCL का प्रोजेक्ट महापालिका के लिए क्यों खास?

BPCL का प्रोजेक्ट महापालिका के लिए आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत फायदे का माना जा रहा है. कंपनी अपने खर्च से प्लांट तैयार करेगी. इसके संचालन, रखरखाव और मरम्मत का खर्च भी BPCL ही उठाएगी. महापालिका को मुख्य रूप से 12 एकड़ जमीन, सड़क, बिजली, सांडपाणी व्यवस्था और सीमाभिंत जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी. इसके साथ ही अलग किए गए गीले कचरे को प्लांट तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी महापालिका की होगी. मंजूरी मिलने के बाद प्लांट तैयार करने में करीब दो साल लग सकते हैं. इसके बाद BPCL करीब 25 वर्षों तक प्रोजेक्ट का संचालन करेगी.

28 लाख टन पुराने कचरे का क्या होगा?

उरुळी देवाची कचरा डेपो की सबसे बड़ी चुनौती वहां जमा पुराना कचरा है. यहां करीब 28 लाख टन पुराने कचरे का बायोमायनिंग अभी बाकी है. इसके लिए चार निविदाओं को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन काम अभी पूरी क्षमता से शुरू नहीं हो पाया है. दूसरी ओर, उपलब्ध जमीन पर भूमीग्रीन का 20 साल का प्रोजेक्ट भी मंजूर हो चुका है. ऐसे में BPCL के लिए जमीन उपलब्ध कराना महापालिका के सामने बड़ी चुनौती बन गया है. पुणे में हर दिन बढ़ते कचरे के बीच अगर जमीन और बायोमायनिंग का मुद्दा जल्द नहीं सुलझा, तो कचरे से गैस बनाने की योजना को जमीन पर उतरने में और समय लग सकता है. यानी प्रोजेक्ट तैयार है, कंपनी तैयार है; अब इंतजार है तो सिर्फ जमीन तैयार होने का.

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