मुंबई : सरकारी रिकॉर्ड सिर्फ कागजों का ढेर नहीं होते, बल्कि संपत्ति के मालिकाना हक और उससे जुड़े अधिकारों का अहम सबूत होते हैं। ऐसे में अगर 32 साल के सरकारी रिकॉर्ड ही गायब हो जाएं, तो सवाल उठना लाजिमी है। मुंबई के कफ परेड स्थित म्हाडा की रामदूत इमारत से जुड़ा ऐसा ही मामला सामने आया है। यहां वर्ष 1975 से 2007 के बीच की मूल सरकारी फाइलें उपलब्ध नहीं होने का खुलासा हुआ है। इस मामले में म्हाडा अधिकारियों ने 19 अक्टूबर 2026 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। अब मुंबई पुलिस की जांच के दायरे में म्हाडा के नौ पूर्व कर्मचारी भी आ सकते हैं।
RTI से शुरू हुआ मामला, हाईकोर्ट तक पहुंची बात
यह पूरा मामला दक्षिण मुंबई के कफ परेड स्थित रामदूत इमारत नंबर 4 के एक फ्लैट से जुड़े दस्तावेजों का है। सूचना के अधिकार कार्यकर्ता प्रशांत सत्यवान कोकणे ने इस फ्लैट से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए आरटीआई के तहत आवेदन किया था। हालांकि, संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई। इसके बाद मामला राज्य सूचना आयोग से होते हुए मुंबई हाईकोर्ट तक पहुंच गया। हाईकोर्ट के सख्त रुख के बाद म्हाडा प्रशासन ने विभागीय जांच शुरू की। जांच समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद अधिकारियों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
महंगे फ्लैट को दूसरे के नाम करने की कोशिश का आरोप
जांच के दौरान यह बात सामने आई कि म्हाडा के अभिलेखागार से करीब 32 वर्षों के मूल सरकारी रिकॉर्ड गायब हैं। आरोप है कि दक्षिण मुंबई जैसे महंगे इलाके में स्थित फ्लैट को किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर हस्तांतरित करने की कोशिश की गई। जांच अधिकारी और कार्यकारी अभियंता अभय रामटेके की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि कुछ अज्ञात भू-माफिया और म्हाडा के तत्कालीन कर्मचारियों की संभावित मिलीभगत से मूल फाइल गायब की गई हो सकती है। रिपोर्ट में प्रशांत पवार नामक एक अपात्र आवेदक को फ्लैट का अवैध हस्तांतरण करने की कोशिश का भी उल्लेख है। हालांकि, इस मामले में आरोपों की सच्चाई और कथित मिलीभगत की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी।
नौ पूर्व कर्मचारियों से पूछताछ की तैयारी
इस मामले में म्हाडा अधिकारी प्रमोद ज्ञानबा कांबले ने महाराष्ट्र सार्वजनिक अभिलेख अधिनियम, 2005 की धारा 9 के तहत पुलिस में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई है। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि मूल फाइल आखिर किसने गायब की, इसके पीछे क्या उद्देश्य था और इस मामले में अन्य कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं। जांच के तहत म्हाडा के नौ पूर्व कर्मचारियों से पूछताछ किए जाने की संभावना है। सरकारी रिकॉर्ड का गायब होना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का सवाल नहीं है, बल्कि इससे संपत्ति के अधिकार और दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं। अब देखना होगा कि पुलिस जांच में इस मामले के पीछे की असल वजह क्या सामने आती है और गायब फाइल का कोई सुराग मिलता है या नहीं।


