BRICS की बढ़ती ताकत से अमेरिका बेचैन? भारत के सोलर पैनल पर 123% तक टैरिफ की तैयारी

अमेरिकी बाजार में सस्ते भारतीय सोलर प्रोडक्ट्स की एंट्री पर उठे सवाल, अक्टूबर में होगा बड़ा फैसला

नई दिल्ली : भारत में BRICS शिखर सम्मेलन के बीच वैश्विक व्यापार को लेकर हलचल तेज है। इसी बीच अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सोलर सेल और सोलर पैनल को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत, इंडोनेशिया और लाओस से आने वाले सोलर प्रोडक्ट्स पर भारी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है।

अमेरिका का आरोप है कि इन देशों की कंपनियां अमेरिकी बाजार में कम कीमत पर सोलर प्रोडक्ट्स बेच रही हैं और उन्हें अपनी सरकारों से अनुचित सब्सिडी भी मिल रही है। अमेरिका का कहना है कि इससे वहां की घरेलू सोलर कंपनियों को नुकसान हो रहा है।

भारत पर 123% से ज्यादा एंटी-डंपिंग मार्जिन

अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारतीय सोलर कंपनियों के लिए 123.04% का एंटी-डंपिंग मार्जिन तय किया है। इसके अलावा अनुचित सब्सिडी के आरोप में भारतीय सोलर प्रोडक्ट्स पर 126.09% का काउंटरवेलिंग ड्यूटी प्रस्तावित किया गया है। यानी भारतीय कंपनियों पर लगने वाला कुल शुल्क काफी ऊंचा हो सकता है। वहीं इंडोनेशिया और लाओस से आने वाले सोलर प्रोडक्ट्स पर भी अलग-अलग दरों से शुल्क लगाने की तैयारी है।

अक्टूबर में सामने आएगा फैसला

इस मामले में 14 अक्टूबर को अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग (USITC) अपना अंतिम निर्णय देगा। आयोग यह देखेगा कि भारत और अन्य देशों से होने वाले आयात से अमेरिकी घरेलू सोलर उद्योग को वास्तव में नुकसान हुआ है या नहीं। अगर आयोग ने आयात के खिलाफ फैसला दिया, तो नवंबर में अमेरिकी वाणिज्य विभाग की ओर से टैरिफ का अंतिम आदेश जारी किया जा सकता है।

अमेरिकी कंपनियों की शिकायत के बाद शुरू हुई जांच

विदेशी सोलर कंपनियों के खिलाफ यह जांच अमेरिकी सोलर कंपनियों के समूह Alliance for American Solar Manufacturing and Trade की शिकायत के बाद शुरू हुई थी। इस समूह में First Solar, Hanwha Qcells और Mission Solar Energy जैसी कंपनियां शामिल हैं। समूह की ओर से इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे अमेरिकी कंपनियों के लिए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की दिशा में कदम बताया गया है।

अब सबकी नजर 14 अक्टूबर के फैसले पर है। अगर प्रस्तावित शुल्क लागू होता है, तो अमेरिका में भारतीय सोलर प्रोडक्ट्स की कीमत और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। साथ ही, भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

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