इजरायल में संसदीय चुनाव के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। चुनावी नतीजे सामने आने के बाद अब विदेशी हस्तक्षेप को लेकर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि कुछ विदेशी देशों ने अरब मतदाताओं को पैसे देकर अपने पक्ष में मतदान कराने की कोशिश की। इस मामले ने इजरायल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अब देश की खुफिया एजेंसी मोसाद इस कथित विदेशी हस्तक्षेप की जांच में शिन बेट की मदद करेगी।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस सप्ताह हुए चुनाव में कतर समेत कुछ अन्य विदेशी देशों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप है कि मतदान केंद्रों पर अरब मतदाताओं की संख्या और मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए उन्हें पैसे दिए गए। हालांकि, इन आरोपों की अभी जांच चल रही है और किसी भी विदेशी देश की भूमिका आधिकारिक तौर पर साबित नहीं हुई है।
अरब पार्टियों का बेहतर प्रदर्शन बना चर्चा का विषय
इस चुनाव में अरब पार्टियों ने कुल 19 सीटें जीतकर अब तक का अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। इसी के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पार्टी के नेताओं ने चुनाव में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाए हैं। चैनल 12 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए ‘द टाइम्स ऑफ इजरायल’ ने बताया कि इस मामले की जांच में मोसाद और इजरायल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट शामिल हैं। अधिकारियों को संदेह है कि कथित विदेशी हस्तक्षेप के पीछे केवल कतर ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य देश भी हो सकते हैं।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
इस पूरे मामले पर इजरायल के केंद्रीय चुनाव आयोग ने साफ किया है कि जांच का दायरा सीमित है। आयोग के मुताबिक, इस जांच से चुनाव के कुल नतीजों पर कोई सवाल नहीं उठता और न ही परिणाम प्रभावित होने की बात सामने आई है। वहीं, शिन बेट ने कहा है कि मतदान समाप्त होने तक इस मामले से जुड़ी खुफिया जानकारी केवल आंतरिक सुरक्षा अधिकारियों और केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति नोआम सोहलबर्ग तक सीमित रखी गई थी। सुरक्षा एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया है कि कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
नेतन्याहू के बेटे के बयान से भी बढ़ा विवाद
चुनाव के बीच राजनीतिक विवाद उस समय और बढ़ गया, जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बेटे याइर नेतन्याहू ने इजरायल के अरब नागरिकों को देश के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के बाद अरब नागरिक इजरायल के सामने सबसे बड़ी चुनौती हैं। उनके इस बयान ने भी राजनीतिक बहस को हवा दी है।
सरकार बनाने के लिए 42 दिनों का समय
इजरायल में चुनाव के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। नियमों के अनुसार, सरकार बनाने के लिए चुने गए नेता को शुरुआत में 28 दिनों का समय दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति इस अवधि को 14 दिन और बढ़ा सकते हैं। यानी सरकार गठन के लिए कुल 42 दिनों का समय मिल सकता है। इस दौरान संबंधित नेता को दूसरी पार्टियों से बातचीत कर समर्थन जुटाना होता है। मंत्रिपदों और नीतियों को लेकर भी गठबंधन के भीतर सहमति बनानी पड़ती है।
फिलहाल इजरायल में चुनावी नतीजों के बाद सत्ता गठन के साथ-साथ कथित विदेशी हस्तक्षेप की जांच पर भी सबकी नजरें टिकी हैं। अब देखना होगा कि मोसाद और शिन बेट की जांच में क्या सामने आता है और इन आरोपों के पीछे की सच्चाई क्या है।


