रश्मी कुळकर्णी ✍️
शारदीय नवरात्री शारदसौंदर्य से परिपूर्ण होती हैं | यह श्रद्धा एवम् भक्ती की आपूर्ती तो होती ही हैं किंतू मातृशक्ती के गुण-दर्शन का दर्पण भी होती हैं | सती पार्वती ने स्वयं आत्मकृती से मातृलिला का महत्त्व विषद किया हैं | सालाना नौ दिन घर-घर में पधारकर हम सबसे आत्मज्योती में स्थित होते हुए साधना में लीन रहने का अभ्यास करवाती हैं और शिव एवम् शक्ती का पारस्परिक सम्मान करने की प्रेरणा देती हैं |
नवरात्री का आठवाँ दिन
” माँ महागौरी ” के रूप की सेवा का होता है | माँ पार्वती भगवान महादेवजी की प्राप्ती हेतू साधनाव्रती अवस्था में कई दिन रत रही …भोलेनाथ उन्हें ढूँढते हुए जब पार्वती देवी के पास पहूँचे तो बड़े ही अचरज में पड गएँ | तीव्र तपस्या के कारण माँ का रूप कृष्णवर्णी हो चुका था | शंकरजी नें देवी को दर्शन दिए और गंगा प्रोक्षण किए | गंगाजी के स्पर्श मात्र से पार्वतीदेवी “गौरवर्णी” हो गई | रंग-रूप तो मात्र बाह्य लिला थी ..किंतू..आंतरिक शुद्धता का भाव माँ महागौरी दर्शाती हैं |
“गौर” ..श्वेत..धवल…शुभ्र!
जो श्वेतवर्ण सौंदर्य दर्शन का महत्त्वपूर्ण पहलू कहलाता हैं वहँ यदी मनोमय कोष के साथ “युती” कर लें तो मन कितना निर्मल होगा !..
यहँ निर्मलता जीव को आंतरबाह्य शुचिता प्रदान करती हैं ! जो अपने आत्मसाक्षात्कार से माँ महागौरी ने हमें सिखायी |
जब मन में सात्विकता का प्रकाश अधिक से अधिक तेजोमयता धारण करता हैं तब नकारात्मकता..आलस्य..विकृती..एवम्..दुर्गुणों की तमोमयता का लोप होता हैं ..और..मन को शांती का ऐश्वर्य प्राप्त होता हैं |
माँ महागौरी श्वेत वृषभ पर आरूढ होती हैं ..जो..ध्येयप्राप्यता के लिए लगनेवाले श्रम..संयम..निग्रह का प्रतीक हैं |
माता चतुर्भुज रूपी हैं..जिसके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में डमरू लिए शक्ती एवम् नादब्रह्म की ज्ञाती होने का प्रमाण हैं..साथ ही में दो कर अभयमुद्रा और वरमुद्रा से कवच एवम् ऐश्वर्य के दात्री होने के साक्षी हैं |
माँ महागौरी स्वयं श्वेतवर्णी होने के साथ साथ हर चढावा श्वेतवर्णी पसंद करती हैं..जैसे..फूल ..मोगरा-जाई…
भोग..नारियल से बनी मिठीई..
माँ महागौरी के अतीव तीव्र साधना से हुई आंतरशुद्धी से बनें पवित्र- विमल – निष्कलंकता के कारण सहस्त्रार चक्र की प्रभा जामुनी रंग उत्सर्जित करती हैं..जो अध्यात्म शास्त्र में सहस्त्रार चक्र की जागृती दर्शाता हैं | साधक की साधना जितनी अधिक…उतनी ही यहँ प्रभा अधिक गहरी !….
वास्तव में हर जीव का जन्म यहीं प्रभा का गहरापन पानें हेतू होता हैं..क्यों की..एकबार इस चक्र की जागृती हो जाती हैं और उदान वायु को अपनी योग से इस द्वार से मुक्त किया जाता हैं…उसके पश्चात फिर गर्भवास की पीडा जीव को झेलनीं नही पडती..
यहीं कारण हैं की माँ महागौरी की सेवा से अपनी तपश्चर्या का ध्येय प्राप्त करते हुए मुक्ती पाने हेतू संतजन अग्रेसर होते हैं |..
इसलिए वे बड़े ही नम्र..शांत..सात्विक..संयमित..संतत कर्मयोगी होते हैं |
और सदाही माता की आराधना में लीन रहते हुए मायामोह के पाश से मुक्त होते हैं..यहीं कारण हैं की संतजनों के सूक्ष्मजीवप्रभा में जामुनी रंग का प्रभुत्व होता हैं |
माता महागौरी सभी को यहँ निर्मलता का आशीर्वाद दें यहँ माँ से नम्र प्रार्थना..
श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।



