प्रीति विनोद दीक्षित ✍️
अश्विनशुद्ध प्रतिपदा से नौ, दिनों का नवरात्रि उत्सव शुरू होता है । जो इस साल ११ अक्टूबर२०२६ को यानी इतवार को शुरू हुआ और देखते ही देखते आज हम इस उत्सव का सातवां दिन मना रहे हैं , जो की ११ अक्टूबर २०२६ शनिवार है। तो देखते हैं आज देवी को कोनसे रूप में पूजा जाता हैं और उसकी विशेषताएं क्या है। सातवें दिन हम माँ कालरात्रि के रूप को पूजते है।
मां कालरात्रि हिंदू धर्म में माँ दुर्गा का सातवां रूप है जिन्हें नवरात्रि के सातवें दिन पूजा जाता है। माँ कालरात्रि का रूप तब प्रकट हुआ था, जब रक्तबीज नाम के राक्षस के आतंक से देवता और सभी मनुष्य त्रस्त थे । इस समस्या का समाधान निकालने के लिए सभी देवता भगवान शिव के पास गए थे तब भगवान शिवजी के कहने पर माता पार्वती ने दैत्य का संहार करने के लिए अपना अत्यंत भयंकर और विशाल रौद्र रूप धारण किया जो की कालरात्रि के नाम से जाना जाता है । माँ कालरात्रि का वर्णन अंधकार की तरह एकदम काला और रूप अत्यंत भयानक हैं। उनके बाल बिखरे हुए हैं, गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला और तीन नेत्र है। माता गर्दभ (गधे) पर सवार होती है । यह चतुर्भुज देवी है
दाहिने हाथ “वर मुद्रा ” और “अभय मुद्रा” में रहते हैं तथा बाएं हाथ में लोहे का काटा (अंकुश) और खड्ग (तलवार) होता हैं। पुराणों के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जब माँ *कालरात्रि और असुर रक्तबीज में युद्ध हुआ था तब माँ कालरात्रि ने रक्तबीज असुर का वध किया और उसका सारा खून अपना मुख को विशाल करके पी लिया था ताकि उसकी एक बूंद भी जमीन पर ना गिर सके । क्योंकि रक्तबीज नाम के राक्षस को यह वरदान था कि उसकी खून की एक बूंद से सैकड़ो असुर पैदा होते थे । तब माँ कालरात्रि ने उसका वध करके पूरी धरती को उसके अत्याचारों से मुक्त किया था । रक्तबीज के साथ-साथ माँ कालरात्रि ने शुंभ और निशुंभ नाम के राक्षसों का भी वध किया था ।
पसंदीदा रंग : देवी का जो पसंदीदा रंग है वह धार्मिक संबंधों से देखा जाए तो ग्रे और भूरा यानी कि ब्राउन रंग है। यह रंग के वस्त्र परिधान करना उस दिन शुभ माना जाता है। यह रंग संतुलन धैर्य और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता दर्शाता है । माँ कालरात्रि का उग्र रूप होने के बावजूद भी इसे शुभंकरी नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उनकी मनोभावसे पूजा करने से भक्तों को हमेशा शुभ फल प्राप्ति होती है । महाकाली, भद्रकाली, चामुंडा और चंडिका, धूम्रवर्ण, रौद्री आदि नामों से भी जाना जाता हैं।
माँ काली का सामान्य मंत्र है ॐ कालरात्र्यै नम:।।
माँ कालरात्रि का भोग : माँ कालरात्रि के भोग में मुख्यतः गुड़ या गुड़ से बने हुए पकवानों का भोग होता है। गुड़ का हलवा, खीर या मालपुआ का भोग लगाया जाता है। यह माँ को बेहद पसंद है। फलों में काले रंग के फल जैसे जामुन और अन्य मौसमी फल देवी माँ को अत्यंत प्रिय है। इसके साथ-साथ मां कालरात्रि को लाल फूल, गुड़हल का फूल या रातरानी का पुष्पा भी अर्पित किया जाता है ।
माँ कालरात्रि माता की आराधना करने से मन को प्रसन्नता होती है तथा इनकी आराधना से भूत प्रेत, अकाल मृत्यु और सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार यह देवी शनि ग्रह को नियंत्रित करती है । इस नकारात्मकता को अगर हम हमारे व्यवहारिक जीवन के हिसाब से सोचे तो हमारे मन में जो नकारात्मक का असुर है वह अंतहीन चक्र का प्रतीक है, जहां एक चिंता सैकड़ो नई चिंताओं को जन्म देती है। तो कालरात्रि देवी हमें यही सिखाती है कि नकारात्मक विचारों को मन में स्थान ना दे। प्राणायाम, ध्यान और सकारात्मक स्वाध्याय से चिंता के मूल बीज को ही समाप्त करें यही असली वैचारिक असुर का वास्तविक शमन है।
अंत में यही प्रार्थना करते हैं
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।



