भारतीय महिला क्रिकेट में हर्मनप्रीत कौर का नाम सिर्फ एक कप्तान के तौर पर नहीं, बल्कि उस खिलाड़ी के रूप में याद किया जाएगा जिसने टीम को डरकर खेलने से बेखौफ होकर जीतने तक का सफर तय कराया। 37 साल की उम्र में कप्तानी से हटने का उनका फैसला भले ही शांत तरीके से सामने आया हो, लेकिन इसके पीछे भारतीय महिला क्रिकेट में आए बड़े बदलाव की पूरी कहानी छिपी है।
हर्मनप्रीत के कप्तान बनने से पहले भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीमों के बीच मुकाबलों में एक अलग तरह का दबाव नजर आता था। लेकिन 2017 के वनडे विश्व कप सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी 171 रनों की तूफानी पारी ने तस्वीर बदल दी। उस पारी ने दुनिया को दिखाया कि भारतीय महिला टीम सिर्फ मुकाबला करने नहीं, बल्कि बड़े मैच जीतने की क्षमता भी रखती है। कप्तानी संभालने के बाद हर्मनप्रीत ने टीम की सोच में भी बदलाव किया। उन्होंने युवा खिलाड़ियों पर भरोसा किया और आक्रामक क्रिकेट को बढ़ावा दिया। 2019 में महज 15 साल की शैफाली वर्मा पर भरोसा करना इसका बड़ा उदाहरण रहा। शैफाली ने भी बाद में अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से इस भरोसे को सही साबित किया।
हर्मनप्रीत की कप्तानी की एक खास बात यह भी रही कि उन्होंने मुश्किल समय में अपनी टीम की खिलाड़ियों का खुलकर साथ दिया। लॉर्ड्स में 2022 के डीप्ति शर्मा रन आउट विवाद के दौरान उन्होंने आलोचनाओं के बीच अपनी साथी खिलाड़ी का बचाव किया। वह सिर्फ मैदान पर कप्तान नहीं थीं, बल्कि ड्रेसिंग रूम में खिलाड़ियों के लिए एक मजबूत सहारा भी थीं। उनकी कप्तानी में भारत ने धीरे-धीरे ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों के सामने आत्मविश्वास दिखाना शुरू किया। लंबे समय तक करीब पहुंचकर हारने वाली भारतीय टीम ने आखिरकार 2025 के वनडे विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया को हराकर अपने ऊपर से उस दबाव को भी हटा दिया। एशिया कप और एशियन गेम्स में मिली सफलताओं ने भी टीम के आत्मविश्वास को मजबूत किया।
हालांकि, इस सफर में हर्मनप्रीत के लिए सब कुछ आसान नहीं रहा। हाल के वर्षों में उनकी बल्लेबाजी पहले जैसी प्रभावी नहीं रही और चोटों ने भी उनका साथ नहीं दिया। कप्तान के तौर पर उनके बनाए ऊंचे मानकों के कारण उनकी हर पारी और हर फैसले पर ज्यादा नजर रही। अब उनकी जगह स्मृति मंधाना को कप्तानी की जिम्मेदारी मिली है। मंधाना लंबे समय से कप्तानी की दावेदार रही हैं और महिला प्रीमियर लीग में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु को दो खिताब दिलाकर उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता भी साबित की है। लेकिन हर्मनप्रीत की कहानी यहां खत्म नहीं होती। मुंबई इंडियंस के साथ महिला प्रीमियर लीग में दो खिताब जीतना भी बताता है कि उनकी नेतृत्व क्षमता सिर्फ भारतीय टीम तक सीमित नहीं रही।
आज जब हर्मनप्रीत कप्तानी छोड़ रही हैं, तब उनके सामने शायद सबसे बड़ी चुनौती खुद को फिर उसी बेखौफ अंदाज में देखने की है, जिसने कभी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 171 रन बनाकर भारतीय क्रिकेट को नई उम्मीद दी थी। हर्मनप्रीत एक ऐसी कप्तान के रूप में जा रही हैं, जिसने टीम को सिर्फ मैच जीतना नहीं सिखाया, बल्कि जीतने की उम्मीद करना भी सिखाया। यही शायद भारतीय महिला क्रिकेट में उनकी सबसे बड़ी विरासत है।


