कोलकाता : पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनाव से पहले चुनाव चिन्ह को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कलकत्ता हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) से ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह वापस लेकर इसे तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट को दिए जाने के मामले में अदालत ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ ने चुनाव आयोग के वकील से कई सवाल किए। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से निष्पक्ष तरीके से काम करने की उम्मीद की जाती है। इसी दौरान अदालत ने सवाल किया कि अगर आयोग किसी निजी पक्ष के कहने पर काम करता है तो फिर क्या बचता है?
एक ही चिन्ह के लिए दो दावे, फैसला कैसे हुआ?
मामले की सुनवाई में अदालत ने इस बात पर भी सवाल किया कि जब एक ही चुनाव चिन्ह के लिए दो आवेदन आए थे, तो आयोग ने फैसला किस आधार पर लिया। अदालत ने पूछा कि दूसरे पक्ष को ‘लिफाफा’ चिन्ह देने के लिए आयोग ने किस प्रावधान का इस्तेमाल किया और ISF का आवेदन खारिज करते समय लिखित कारण क्यों नहीं बताए गए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी राजनीतिक दल का किसी चुनाव चिन्ह पर हमेशा के लिए अधिकार नहीं होता। हालांकि, इस मामले में चिन्ह आवंटित करने की प्रक्रिया और उसके आधार को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
ISF का कहना- इसी चिन्ह पर पहले चुनाव लड़ा
ISF की ओर से अदालत में बताया गया कि पार्टी ने 2024 का लोकसभा चुनाव और इस साल का विधानसभा चुनाव ‘लिफाफा’ चिन्ह पर लड़ा था। अब नंदीग्राम उपचुनाव के लिए इसी चिन्ह की मांग करने पर उसे ‘कपाट’ चिन्ह दे दिया गया। ISF ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। पार्टी की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि जिस क्षेत्र में पहले किसी दल ने एक खास चिन्ह का इस्तेमाल किया हो, उसी चिन्ह को किसी दूसरे दल को देने से चुनाव में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
टीएमसी के बागी गुट को मिला ‘लिफाफा’
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर बगावत के बाद दो गुट सामने आए। दोनों गुटों ने पार्टी के नाम और ‘जोड़ाफूल’ चिन्ह पर दावा किया था। इसके बाद चुनाव आयोग ने ‘जोड़ाफूल’ चिन्ह को फ्रीज कर दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह दिए।ममता बनर्जी के गुट को फुटबॉल खिलाड़ी का चिन्ह मिला, जबकि बागी गुट को ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया। यही ‘लिफाफा’ चिन्ह पहले ISF के पास था।
अब हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार
चुनाव आयोग की ओर से दलील दी गई कि ‘लिफाफा’ फिलहाल एक मुक्त चुनाव चिन्ह है और किसी राजनीतिक दल का उस पर कानूनी या स्थायी अधिकार नहीं है। वहीं ISF की ओर से आयोग के फैसले को तर्कसंगत और प्रक्रिया के अनुरूप होने की बात कही गई। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत के फैसले पर नजर है, क्योंकि इसका सीधा संबंध आगामी उपचुनाव में चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से जुड़ा है।


