पुणे : गणेशोत्सव शुरू होने से पहले ही पुणे में ‘साउंड’ को लेकर विवाद गहराने लगा है। गणेश मंडलों और पुलिस प्रशासन के बीच लाउडस्पीकर और डीजे की आवाज को लेकर मतभेद सामने आए हैं। मंडलों का आरोप है कि हर साल गणेशोत्सव के समय ही नए नियम और पाबंदियां सामने रखी जाती हैं। वहीं प्रशासन का कहना है कि ध्वनि सीमा को लेकर किए जा रहे नियम सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर आधारित हैं।
पुणे का गणेशोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि शहर की पहचान और सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में उत्सव की तैयारियां शुरू होते ही साउंड सिस्टम को लेकर उठे सवालों ने गणेश मंडलों की चिंता बढ़ा दी है।गणेश मंडलों के कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुलिस प्रशासन की ओर से उत्सव के दौरान बजने वाले साउंड पर जरूरत से ज्यादा प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाते हुए कहा कि सालभर होने वाले अलग-अलग त्योहारों के दौरान ऐसी पाबंदियां क्यों नहीं दिखाई देतीं और गणेशोत्सव आते ही नए नियम क्यों सामने आते हैं। मंडल प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि हर मंडल में ढोल-ताशा पथक लगाना संभव नहीं है। शहर में पर्याप्त संख्या में पथक उपलब्ध नहीं हैं और बड़े मंडलों के लिए उनका खर्च उठाना आसान हो सकता है, लेकिन छोटे मंडलों के लिए यह आर्थिक रूप से मुश्किल है।
हालांकि मंडलों ने तेज आवाज वाले ‘प्लाज्मा साउंड’ का विरोध करने की बात भी कही है। लेकिन उनका सवाल है कि पर्यावरण और ध्वनि प्रदूषण को लेकर चिंता सिर्फ गणेशोत्सव के दौरान ही क्यों दिखाई देती है। मंडल प्रतिनिधियों का दावा है कि डीजे को लेकर शिकायतों की संख्या बेहद कम होती है, जबकि अधिकांश लोग उत्सव में शामिल होने के लिए सड़कों पर मौजूद रहते हैं। एक गणेश मंडल प्रतिनिधि ने यहां तक कहा कि जिन लोगों को उत्सव के दौरान होने वाले शोर से परेशानी होती है, उनके लिए मंडल सहयोग करने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि नियमों का पालन होना चाहिए, लेकिन प्रतिबंधों का अतिरेक भी नहीं होना चाहिए। खासकर गलियों और छोटे इलाकों में रहने वाले लोगों को लेकर भी वास्तविक स्थिति समझने की जरूरत है। वहीं जलसंपदा और आपदा प्रबंधन मंत्री गिरीश महाजन ने आयोजकों और भक्तों से लाउडस्पीकर के निर्धारित नियमों का पालन करने की अपील की है। उनका कहना है कि ये प्रतिबंध पुलिस प्रशासन द्वारा मनमाने तरीके से नहीं लगाए गए हैं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर आधारित हैं। उन्होंने सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए गणेशोत्सव मनाने की अपील की है।
महाजन ने यह भी कहा कि पुणे का गणेशोत्सव अपनी भव्यता के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक परंपरा के लिए भी जाना जाता है। इसलिए आयोजकों की जिम्मेदारी है कि उत्सव के कारण स्थानीय निवासियों को अनावश्यक परेशानी न हो और उत्सव की गरिमा भी बनी रहे। अब देखना यह होगा कि गणेशोत्सव के दौरान साउंड को लेकर गणेश मंडलों और पुलिस प्रशासन के बीच किस तरह का संतुलन बनता है। एक तरफ वर्षों पुरानी उत्सव परंपरा और कार्यकर्ताओं का उत्साह है, तो दूसरी तरफ नियमों और नागरिकों की सुविधा का सवाल है। इसी संतुलन के बीच इस साल पुणे का गणेशोत्सव किस तरह आगे बढ़ता है, इस पर सभी की नजर रहेगी।


