हर जगह कैमरा है, फिर भी यादें कम क्यों हो रही हैं?

हर पल कैद कर रहे हैं, लेकिन जीना कहीं पीछे छूट रहा है…

आज हमारे आसपास कैमरे ही कैमरे हैं। मोबाइल निकालिए और कुछ ही सेकंड में किसी भी पल की तस्वीर या वीडियो तैयार। जन्मदिन हो, दोस्तों के साथ मुलाकात हो, परिवार का छोटा-सा समारोह हो या घूमने का कोई खूबसूरत पल—हमारी पहली प्रतिक्रिया अक्सर यही होती है, “रुको, पहले फोटो लेते हैं।”

लेकिन कभी-कभी यही सवाल मन में आता है—जब हमारे पास यादों को संभालकर रखने के इतने साधन हैं, तो फिर बचपन और पुराने दिनों की यादें आज भी ज्यादा गहरी क्यों लगती हैं?

पहले किसी शादी में लोग घंटों बैठकर रिश्तेदारों से बातें करते थे। अब उसी शादी में कई लोग पहले सजावट, खाना और मंच की तस्वीरें लेने में व्यस्त दिखाई देते हैं। किसी दोस्त के साथ वर्षों बाद मुलाकात हो तो बातचीत शुरू होने से पहले कैमरा ऑन हो जाता है। पहाड़ों पर पहुंचकर सामने के नजारे को देखने से पहले मोबाइल का कैमरा खुल जाता है।

मान लीजिए, कोई परिवार लंबे समय बाद साथ बैठकर खाना खाने गया। मेज पर खाना है, सामने अपने लोग हैं, लेकिन बीच-बीच में कोई फोटो ले रहा है, कोई वीडियो बना रहा है और कोई उसे तुरंत सोशल मीडिया पर साझा कर रहा है। कुछ साल बाद उस दिन की तस्वीरें तो फोन में मिल जाएंगी, लेकिन क्या उस शाम की हंसी, बातचीत और साथ बैठने का एहसास उतना ही साफ याद रहेगा?

शायद समस्या कैमरे में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब कैमरा किसी पल को याद रखने का माध्यम नहीं, बल्कि उस पल को जीने का विकल्प बन जाता है।

आज हम कई खूबसूरत जगहों पर जाते हैं, लेकिन वहां पहुंचकर हमारी नजर सामने के दृश्य से ज्यादा स्क्रीन पर होती है। हम बारिश की बूंदों को महसूस करने के बजाय उनका वीडियो बना लेते हैं। किसी बच्चे की मासूम हंसी को सुनने के बजाय उसे रिकॉर्ड करने लगते हैं। किसी खास मुलाकात में सामने बैठे व्यक्ति की आंखों में देखने के बजाय हम सोचते हैं कि यह पल तस्वीर में कैसा लगेगा।

और शायद इसी वजह से कुछ यादें तस्वीरों में तो मौजूद रहती हैं, लेकिन मन में उतनी गहराई से नहीं।

इसका मतलब यह नहीं कि हर पल कैमरे से दूर रहना चाहिए। तस्वीरें और वीडियो भी यादों का खूबसूरत हिस्सा हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम तस्वीर लेने के बाद उस पल को कुछ देर सच में जीते भी हैं?

कभी-कभी फोन जेब में रखकर सिर्फ सामने बैठे इंसान से बात करना, बिना रिकॉर्ड किए किसी हंसी को याद रखना और बिना तस्वीर लिए किसी खूबसूरत दृश्य को देखना भी जरूरी है।

क्योंकि हर खूबसूरत पल को कैमरे में कैद करना जरूरी नहीं होता।
कुछ पल ऐसे भी होने चाहिए, जो किसी गैलरी में नहीं, सीधे हमारी यादों में सुरक्षित रहें।

लोकतंत्र मिरर

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