वाशीम/नागपुर : महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण विधेयक 2026 विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित होने के बाद राज्य की महिलाओं को पहली बार स्वतंत्र किसान के रूप में कानूनी पहचान मिलने का रास्ता साफ हो गया है। इस निर्णय का स्वागत करते हुए बहुजन समाज पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. एड. संदीप ताजने ने ग्रामीण क्षेत्र की खेत मजदूर महिलाओं के लिए न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा का अलग कानून जल्द लागू करने की मांग की है।
डॉ. ताजने ने कहा कि महिलाओं के श्रम को सम्मान और न्याय मिले बिना कृषि क्षेत्र का समग्र विकास संभव नहीं है। बुआई, निराई, कटाई, पशुपालन और कृषि प्रसंस्करण जैसे लगभग सभी कार्यों में महिलाओं की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन उन्हें आज भी कम मजदूरी, असुरक्षित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अभाव का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने खेत मजदूर महिलाओं को सम्मानजनक मजदूरी, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, मातृत्व लाभ, कौशल विकास के अवसर और सरकार की सभी कृषि योजनाओं में समान प्राथमिकता देने की मांग की। उनका कहना है कि महिलाओं के श्रम को केवल मान्यता देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा देना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की पीएलएफएस 2024-25 रिपोर्ट का हवाला देते हुए डॉ. ताजने ने बताया कि महाराष्ट्र की ग्रामीण कार्यरत महिलाओं में 57.4 प्रतिशत महिलाएं स्वरोजगार में हैं, जबकि 33.9 प्रतिशत महिलाएं खेत मजदूर के रूप में काम करती हैं। यानी लगभग हर तीसरी महिला असंगठित और असुरक्षित मजदूरी पर निर्भर है। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार देश में केवल 13.9 प्रतिशत महिला कृषक हैं, जबकि महाराष्ट्र में 23 लाख से अधिक महिला कृषि धारक हैं। वहीं जनगणना 2011 के अनुसार राज्य में लगभग 52 लाख महिला कृषि मजदूर हैं और इनमें से बड़ी संख्या कम वेतन, असुरक्षित रोजगार और निर्णय प्रक्रिया में दोयम दर्जे जैसी समस्याओं से जूझ रही है। डॉ. ताजने ने कहा कि महिलाओं को कानूनी रूप से किसान का दर्जा देना महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसके साथ खेत मजदूर महिलाओं को भी न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और कृषि योजनाओं में समान अधिकार मिलना जरूरी है।


