डॉ. नंदिनी खाडे ✍️
भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर रत्नागिरी जिले में, रत्नागिरी से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक रमणीय गणेश तीर्थस्थल है—गणपतीपुळे। अरब सागर के किनारे स्थित यह लगभग 400 वर्ष पुराना अत्यंत प्राचीन मंदिर है।
कोंकणी भाषा में रेत के टीले को ‘पुळे’ कहा जाता है। इसी से इस स्थान का नाम गणपतीपुळे पड़ा।
यहां के गणपति स्वयंभू गणपति हैं और मंदिर पहाड़ की गोद में बनाया गया है। यह पूरा पहाड़ ही गणपति का स्वरूप माना जाता है। श्रद्धालु इस पहाड़ की ही पूरी परिक्रमा करते हैं, जो लगभग 1 किलोमीटर लंबी है। पहाड़ के आकार में गणपति की सूंड और शरीर के अन्य भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस परिक्रमा मार्ग से समुद्र का दर्शन भी होता है, जो इसे रोमांचकारी और आनंददायक अनुभव बनाता है।
इसे ‘पश्चिम द्वार देवता’ भी कहा जाता है, क्योंकि गणपति की मूर्ति पश्चिममुखी है।
गणपतीपुळे के गणपति नवस पूरा करने वाले हैं, ऐसी भी एक मान्यता है।
इस मंदिर का इतिहास बताता है कि प्राचीन काल में यहां केवड़े का वन था। उस समय यहां बालंभट्ट भिड़े नामक एक ब्राह्मण रहते थे। एक बार उन पर बड़ा संकट आया। संकट से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने केवड़े के वन में अपने आराध्य श्री गणेश की तपस्या शुरू की। तब गणेश ने उन्हें दृष्टांत देकर कहा, “मैं इस स्थान पर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए आगरगुळे (गणेशगुळे) से दो गंडस्थल और दंतयुक्त स्वरूप धारण करके प्रकट हुआ हूं। मेरा निराकार स्वरूप यह पहाड़ है।” उन्होंने तुरंत आसपास के परिसर की सफाई की। इसके बाद उन्हें वहां वर्तमान मंदिर में विराजमान स्वयंभू गणपति की मूर्ति मिली। उसी स्थान पर उन्होंने घास की छत वाला एक कच्चा मंदिर बनाया।
वर्तमान मंदिर का निर्माण वर्ष 1998 से 2003 के बीच हुआ। प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला से युक्त इस मंदिर के निर्माण के लिए आगरा से विशेष रूप से लाल रंग का पत्थर लाया गया था। मंदिर के दक्षिण और उत्तर दिशा में पांच-पांच त्रिपुर हैं। त्रिपुरी पूर्णिमा के अवसर पर इन पर जलाए जाने वाले दीपों से पूरा आसमान और आसपास का परिसर जगमगा उठता है। हर वर्ष नवंबर और फरवरी महीने में सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें सीधे स्वयंभू गणेश के दर्शन करती हैं। इसी तरह, बारिश के मौसम में ज्वार के समय समुद्र की लहरें सीधे मंदिर के अंदर आकर गणेश के चरणों का स्पर्श करती हैं। ये दृश्य देखने वालों को रोमांचकारी और सुखद अनुभव देते हैं।
यहां श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए भक्त निवास है, जहां लगभग 100 श्रद्धालुओं के रहने की व्यवस्था है। इसके अलावा कई निजी होटल, रिसॉर्ट और महाराष्ट्र पर्यटन विभाग की ओर से भी उचित दरों पर रहने की सुविधा उपलब्ध है। गणपतीपुळे समुद्र तट पर स्थित देवस्थान होने के कारण पर्यटन स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध हो चुका है। यहां से दिखाई देने वाला सूर्यास्त का सौंदर्य बेहद अद्भुत होता है। यहां से कुछ ही दूरी पर कई दर्शनीय स्थल हैं। प्रसिद्ध कवि केशवसुत का जन्मस्थान मालगुंड, प्राचीन कोकण संग्रहालय, आरेवारे समुद्र तट आदि देखने योग्य स्थान हैं। जयगढ़ किला भी देखने लायक है।
गणपतीपुळे नागपुर से लगभग 1000 किलोमीटर, पुणे से 330 किलोमीटर और मुंबई से 375 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां सीधे सड़क मार्ग से जाया जा सकता है। ट्रेन से कोल्हापुर तक पहुंचने के बाद वहां से बस या निजी वाहन द्वारा समुद्र तट के समानांतर सड़क से यात्रा की जा सकती है। आसपास के सह्याद्रि के सुंदर हरे-भरे दृश्य, घाटियां, नारियल के पेड़ देखते हुए किया गया यह सफर मन को प्रसन्न कर देता है।
यहां का भूभाग समुद्र की ओर ढलान वाला होने के कारण समुद्र तट पर खेलते समय सावधानी बरतना आवश्यक है।
गणपतीपुळे को प्राप्त नेत्रदीपक प्राकृतिक सौंदर्य को देखते हुए मिलने वाली प्रसन्नता और स्वयंभू गणेश के दर्शन से प्राप्त होने वाली अद्भुत आध्यात्मिक शांति—इन दोनों का अनुभव लेने के लिए श्रद्धालु और पर्यटक इस देवस्थान पर बड़ी संख्या में आते हैं। सभी को कम से कम एक बार इस देवस्थान की यात्रा अवश्य करनी चाहिए।


