दिल्ली में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान 17 मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र सरकार समेत दिल्ली पुलिस, दिल्ली सरकार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) से जवाब मांगा है। मामला सिर्फ मेट्रो बंद होने का नहीं, बल्कि इस सवाल का है कि कानून-व्यवस्था के नाम पर आम लोगों के लिए सार्वजनिक परिवहन की सुविधा को कितनी देर और किन परिस्थितियों में रोका जा सकता है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए किसी सार्वजनिक सुविधा को बंद करने का कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि मेट्रो स्टेशन बंद करने का फैसला आनुपातिक होना चाहिए और लोगों के अधिकारों पर जरूरत से ज्यादा असर नहीं पड़ना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं, ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में अदालतें आमतौर पर कार्यपालिका के फैसलों में दखल देने से बचती हैं। लेकिन अगर किसी फैसले का इस्तेमाल अनुपातहीन तरीके से किया जाता है, तो न्यायिक समीक्षा की जरूरत पड़ सकती है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संजीव नारंग ने कहा कि सवाल प्रदर्शनकारियों के अधिकारों तक सीमित नहीं है। असली मुद्दा यह है कि किसी सार्वजनिक सुविधा को बंद करने के लिए संवैधानिक और कानूनी मानक क्या होने चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मेट्रो स्टेशन बंद करने के संबंध में कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं किया गया था और जनता को इसकी जानकारी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दी गई। वकील ने Supreme Court of India के अनुराधा भसीन और रामलीला मैदान मामले में दिए गए अनुपातिकता के सिद्धांतों का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि विरोध-प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए सबसे कम प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाया जाना चाहिए।
वहीं, न्यायमूर्ति बागची ने सवाल उठाया कि कानून-व्यवस्था की स्थिति में लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करना पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में अदालतें परंपरागत रूप से कार्यपालिका के फैसलों को महत्व देती रही हैं। अब सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि संबंधित परिस्थितियों में मेट्रो स्टेशन बंद करने की कार्यपालिका की शक्ति का इस्तेमाल किस तरह किया गया। यानी आने वाले समय में यह मामला सिर्फ दिल्ली मेट्रो तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि विरोध-प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक सुविधाओं को बंद करने के लिए अपनाए जाने वाले तरीके पर भी अहम सवाल खड़े कर सकता है।


