नई दिल्ली : भारतीय वायुसेना की एक महिला अधिकारी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का मामला एक बार फिर चर्चा में है। दिसंबर 2011 में अधिकारी 85 से 90 प्रतिशत तक झुलसी हालत में मिली थीं। उन्हें पहले जोधपुर और बाद में पुणे के कमांड हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए सहमति जताई है। मामले में अधिकारी के कमांडिंग ऑफिसर की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
अस्पताल में इलाज के दौरान हुई थी मौत
घटना के बाद महिला अधिकारी को बेहद गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया गया था। बताया गया कि वह बेहोशी और कोमा की स्थिति में थीं। डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद उनकी जान नहीं बच सकी। शुरुआती तौर पर इस घटना को हादसा माना गया था, लेकिन बाद में सामने आए तथ्यों ने इस कहानी पर सवाल खड़े कर दिए।
हादसा या कुछ और? जांच पर उठे सवाल
सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के रिकॉर्ड में घटना से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे केवल दुर्घटना की थ्योरी पर संदेह पैदा हुआ। अधिकारी के शरीर पर जले हुए घावों का स्वरूप और घटनास्थल से जुड़े कुछ तथ्य हादसे की कहानी से पूरी तरह मेल नहीं खाते थे। AFT ने 2017 में मामले की स्वतंत्र और नए सिरे से जांच के निर्देश दिए थे। हालांकि, ये निष्कर्ष AFT के 2017 के आदेश का हिस्सा हैं और सुप्रीम कोर्ट में चल रही मौजूदा कार्यवाही में अभी इन पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
कमांडिंग ऑफिसर से संबंधों को लेकर भी सवाल
न्यायाधिकरण के रिकॉर्ड के अनुसार, महिला अधिकारी और उनके कमांडिंग ऑफिसर के बीच संबंध तनावपूर्ण थे। परिवार की ओर से भी अधिकारी की परिस्थितियों को लेकर चिंता जताई गई थी। इसी आधार पर कमांडिंग ऑफिसर की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। अब याचिकाकर्ता के वकील ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ के सामने मामला उठाते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे सुनवाई के लिए लेने पर सहमति जताई है।
अब आगे की सुनवाई में न्यायालय के सामने पुराने रिकॉर्ड, AFT के आदेश, जांच की स्थिति और दोनों पक्षों की दलीलें रखी जा सकती हैं। करीब 15 साल पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह उम्मीद जगी है कि घटना से जुड़े अनसुलझे सवालों पर अब न्यायिक स्तर पर आगे की तस्वीर साफ हो सकती है।


