मुंबई : फर्जी अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले मुंबई के एक जूनियर सिविल इंजीनियर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। करीब 30 वर्षों तक नौकरी करने के बाद उनका जात प्रमाणपत्र अवैध पाया गया था। इसके बावजूद अदालत ने उन्हें सीधे बर्खास्त करने के बजाय स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने की अनुमति दी है। साथ ही नियमानुसार पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ देने का रास्ता भी साफ कर दिया गया है।
मामला बृहन्मुंबई नगर निगम (MCGM) में जूनियर सिविल इंजीनियर के पद पर कार्यरत शिरीष पाटील से जुड़ा है। पाटील ने वर्ष 1984 में टोकरे कोली जाति का प्रमाणपत्र हासिल किया था। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर वर्ष 1994 में उन्हें MCGM में नौकरी मिली थी।
30 साल की नौकरी के बाद उठा प्रमाणपत्र पर सवाल
नौकरी के दौरान उनके जाति प्रमाणपत्र को लेकर जांच शुरू हुई। बताया गया कि उनके पूर्वजों की जाति कोली, हिंदू कोली और हिंदू सूर्यवंशी कोली थी, जो अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं है। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि मूल प्रमाणपत्र खो जाने का दावा करते हुए उन्होंने भुसावल के उपविभागीय मजिस्ट्रेट से नया प्रमाणपत्र हासिल किया था। इसके बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया।
2009 में नोटिस, 2020 में प्रमाणपत्र रद्द
MCGM की ओर से जुलाई 2009 में शिरीष पाटील को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। हालांकि, उन्होंने वकील और परिवार के सदस्यों की अनुपलब्धता का हवाला देते हुए लंबे समय तक कार्रवाई को टालने की कोशिश की। आखिरकार वर्ष 2020 में जाति पडतालणी समिति ने उनका प्रमाणपत्र अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी राहत?
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने पूरे मामले की परिस्थितियों और कर्मचारी की लंबी सेवा अवधि को ध्यान में रखा। पाटील ने 30 जून 2025 तक MCGM में सेवा की थी। अदालत ने उन्हें बर्खास्त करने के बजाय स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने की अनुमति दी। इसके साथ ही नियमानुसार पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ देने की भी अनुमति दी गई।
फैसले ने खड़े किए कई सवाल
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक तरफ जात प्रमाणपत्र को अवैध ठहराया गया, वहीं दूसरी तरफ करीब तीन दशक तक सरकारी सेवा कर चुके कर्मचारी को बर्खास्तगी से राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लंबे समय तक सेवा कर चुके कर्मचारियों के मामलों में परिस्थितियों और सेवा अवधि को ध्यान में रखने के महत्व को भी सामने लाता है।


