नागपुर : महाराष्ट्र में इस साल कम बारिश ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कई इलाकों में खरीफ की फसलें सूख गई हैं, तो कहीं उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका है। ऐसे में किसानों की उम्मीद अब रबी की फसल पर टिकी है। लेकिन बांधों के पानी का आरक्षण 31 अगस्त 2027 तक तय किए जाने से रबी की सिंचाई के लिए पानी मिलने पर सवाल खड़े हो गए हैं। किसान पहले ही मौसम की मार झेल रहे हैं, ऐसे में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता भी सीमित हुई, तो उनकी आर्थिक मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
कहीं ज्यादा बारिश, तो कहीं सूखे जैसे हालात
1 जून से 30 सितंबर के बीच महाराष्ट्र में औसतन 804.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य बारिश से 19 प्रतिशत कम है। नासिक, पुणे, पालघर, सातारा और मुंबई उपनगर जैसे कुछ जिलों में औसत से 10 से 33 प्रतिशत अधिक बारिश हुई। वहीं, मराठवाड़ा के सभी जिलों सहित मध्य महाराष्ट्र और विदर्भ के कई हिस्सों में बारिश की कमी दर्ज की गई।
बारिश की इस असमान स्थिति ने किसानों के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिन इलाकों में पानी की कमी है, वहां खेती बचाना मुश्किल हो रहा है। वहीं, जिन क्षेत्रों में पर्याप्त जलसंचय उपलब्ध है, वहां भी सिंचाई के लिए पानी के इस्तेमाल को लेकर नियमों और प्रतिबंधों के कारण किसानों की चिंता बढ़ रही है।
खरीफ के बाद अब रबी से उम्मीद
किसानों के लिए खरीफ का मौसम पहले ही अनिश्चितताओं से भरा रहा। लंबे समय तक बारिश नहीं होने से कई जगह फसलें प्रभावित हुई हैं। अब रबी की बुवाई और फसलों की बढ़वार के लिए पानी जरूरी है। रबी से होने वाली कमाई पर ही कई किसानों की अगली खरीफ की तैयारी, बीज, खाद और खेती के अन्य खर्च निर्भर रहते हैं। ऐसे में अगर समय पर सिंचाई का पानी नहीं मिला, तो नुकसान केवल एक फसल तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर किसानों की अगली खेती और घरेलू आर्थिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
जायकवाड़ी बांध में भी पानी को लेकर चिंता
मराठवाड़ा की जीवनरेखा माने जाने वाले जायकवाड़ी बांध में पर्याप्त जलसंचय दिखाई देने के बावजूद भविष्य की जरूरतों को लेकर चिंता जताई जा रही है। बांध में लगभग 25 प्रतिशत तक गाद जमा होने और बढ़ते तापमान के कारण पानी का वाष्पीकरण होने से उपलब्ध जलसंचय पर दबाव बढ़ सकता है। जानकारी के अनुसार, पिछले दो महीनों में बांध का जलस्तर 17 प्रतिशत तक घटा है। मराठवाड़ा में करीब 60 दिनों तक बारिश नहीं होने से खरीफ की फसलों को नुकसान पहुंचा है और उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत तक गिरावट की आशंका जताई जा रही है। क्षेत्र के मध्यम और लघु सिंचाई प्रकल्पों में भी पानी की उपलब्धता सीमित बताई गई है।
सूखे की स्थिति का जायजा लेगा केंद्रीय दल
मराठवाड़ा में फसलों को हुए नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्रीय दल 8 से 11 अक्टूबर के बीच महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करेगा। 9 और 10 अक्टूबर को दल के सदस्य खेतों में जाकर स्थिति का जायजा लेंगे। इसके बाद वस्तुस्थिति पर आधारित रिपोर्ट तैयार की जाएगी। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के मानदंडों के तहत सहायता देने की प्रक्रिया में इस रिपोर्ट की अहम भूमिका हो सकती है। किसानों को अब फसल नुकसान के आकलन और संभावित सहायता की घोषणा का इंतजार है।
कम पानी में खेती और सिंचाई के विकल्प जरूरी
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक और सेवानिवृत्त सहयोगी अनुसंधान संचालक डॉ. प्रमोद यादगीरवार ने मौजूदा हालात में पानी के आरक्षण संबंधी फैसले पर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई है। उनके अनुसार, किसानों को कम पानी में तैयार होने वाली रबी फसलों के बीज उपलब्ध कराने के साथ ड्रिप सिंचाई उपकरणों की व्यवस्था जल्द की जानी चाहिए। बीज उत्पादन और सब्जियों की खेती को भी प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जीवित नदियों, नालों और अन्य जलस्रोतों के पानी का सिंचाई के लिए उपयोग करने में अनावश्यक बाधाएं नहीं होनी चाहिए। संभावित संकट को देखते हुए सरकार को अपने फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए और नई निर्णय प्रक्रिया में कृषि वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों, किसानों तथा कृषि क्षेत्र के जानकारों को शामिल करना चाहिए।
फैसला ऐसा हो, जिससे किसान की खेती बच सके
पानी का नियोजन जरूरी है, लेकिन उसके साथ खेती और किसानों की आजीविका का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिन इलाकों में जलसंकट गंभीर है, वहां पानी का विवेकपूर्ण उपयोग जरूरी है। वहीं, पर्याप्त जलसंचय वाले क्षेत्रों में उपलब्ध पानी का उपयोग किस तरह किया जा सकता है, इस पर भी व्यावहारिक विचार होना चाहिए। खरीफ में नुकसान झेल चुके किसानों के लिए रबी केवल अगली फसल नहीं, बल्कि आर्थिक नुकसान से उबरने की उम्मीद भी है। ऐसे में पानी के आरक्षण पर पुनर्विचार, समय पर सिंचाई की सुविधा और किसानों की भागीदारी से लिया गया निर्णय राहत का रास्ता खोल सकता है।


